Success: कांकेर के MA पास युवा ने नौकरी छोड़ उगाया ऑर्गेनिक चिन्नौर चावल

आज के दौर में उच्च शिक्षा हासिल करने के बाद अधिकांश युवा शहरों की ओर रुख करते हैं और कॉर्पोरेट नौकरियों की तलाश में जुट जाते हैं। लेकिन छत्तीसगढ़ के आमाबेड़ा स्थित ग्राम चिचगांव के निवासी सोनूराम ध्रुव की राह बिल्कुल अलग रही। अर्थशास्त्र में एमए की डिग्री लेने के बावजूद उन्होंने नौकरी के बजाय…

उच्च शिक्षा के बाद खेती में क्रांति: सोनूराम ध्रुव ने नक्सल प्रभावित क्षेत्र में लिखी सफलता की नई इबारत

आज के दौर में उच्च शिक्षा हासिल करने के बाद अधिकांश युवा शहरों की ओर रुख करते हैं और कॉर्पोरेट नौकरियों की तलाश में जुट जाते हैं। लेकिन छत्तीसगढ़ के आमाबेड़ा स्थित ग्राम चिचगांव के निवासी सोनूराम ध्रुव की राह बिल्कुल अलग रही। अर्थशास्त्र में एमए की डिग्री लेने के बावजूद उन्होंने नौकरी के बजाय अपनी पुश्तैनी जमीन को ही अपनी पहचान बनाने का फैसला किया। कभी नक्सलवाद की छाया में रहे इस अंचल में आज सोनूराम ने अपनी वैज्ञानिक सोच और कड़ी मेहनत से जैविक खेती का एक ऐसा मॉडल पेश किया है, जिसे देखने के लिए दूर-दराज से लोग आ रहे हैं।

जोखिम भरा फैसला और जैविक खेती का सफर

सोनूराम का यह सफर आसान नहीं था। साल 2015 में जब उन्होंने जैविक खेती की शुरुआत की, तो लोग उन पर हंसते थे। रासायनिक खादों और कीटनाशकों के दौर में बिना यूरिया और डीएपी के खेती करना उस समय एक बड़ा जोखिम माना जाता था। हालांकि, सोनूराम ने हार नहीं मानी और खेती में आधुनिक तकनीकी का समावेश किया। उन्होंने अपने 10 एकड़ के खेत में टपक सिंचाई (ड्रिप इरिगेशन) तकनीक अपनाई और जल प्रबंधन को बेहतर बनाया।

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पंचमहाभूत और वैज्ञानिक दृष्टिकोण

सोनूराम ने खेती में ‘ताराचंद बेलजी तकनीक’ का सहारा लिया, जो पूरी तरह से वृक्ष आयुर्वेद और प्राकृतिक सिद्धांतों पर आधारित है। उन्होंने अपने खेतों को भूमि, गगन, वायु, अग्नि और जल यानी ‘पंचमहाभूत’ के सिद्धांतों से जोड़ा। उनका मानना है कि जब हम प्रकृति के इन पांच तत्वों के साथ संतुलन बनाकर चलते हैं, तो मिट्टी की उर्वरा शक्ति स्वतः ही लौट आती है। मिट्टी की सेहत सुधारने के लिए उन्होंने तिल की फसल उगाई और उसके अवशेषों को मिट्टी में ही मिला दिया, जिससे जमीन का जैविक कार्बन और पीएच स्तर संतुलित हो गया।

खेत की उपज और मुनाफे का गणित

सोनूराम ने रासायनिक उत्पादों पर निर्भरता पूरी तरह खत्म कर दी है। वे घर पर ही नींबू, पपीता, हर्रा और अन्य औषधीय पौधों से जैविक खाद और कीटनाशक तैयार करते हैं। उनकी मेहनत का ही नतीजा है कि आज वे साल भर में 8 लाख रुपये से अधिक की शुद्ध कमाई कर रहे हैं।

फसल का प्रकारविशेषताबाजार मूल्य/मांग
चिन्नौर धानपूरी तरह जैविक₹150 प्रति किलो
ब्लैक राइसऔषधीय गुणों से भरपूरउच्च मांग
काली हल्दी/काली मिर्चनकदी फसलेंसफल प्रयोग

किसानों के लिए सोनूराम का संदेश

सोनूराम ध्रुव का मानना है कि रासायनिक खाद न केवल जमीन को बंजर बना रही है, बल्कि खेती की लागत भी बढ़ा रही है। उन्होंने अन्य किसानों को निम्नलिखित सुझाव दिए हैं:

  • लागत कम करें: स्थानीय संसाधनों से जैविक खाद बनाकर किसान कर्ज के दलदल से बाहर निकल सकते हैं।
  • विविधता लाएं: केवल पारंपरिक धान पर निर्भर रहने के बजाय चिन्नौर धान, रागी, काली हल्दी और काली मिर्च जैसी नकदी फसलों का चुनाव करें।
  • वैज्ञानिक सोच: खेती को प्राचीन ज्ञान और आधुनिक विज्ञान के तालमेल से अपनाएं।

आज सोनूराम की मेहनत न केवल उनके परिवार को आर्थिक रूप से सशक्त बना रही है, बल्कि पूरे क्षेत्र के लिए प्रेरणा का स्रोत बनी है। वे गर्व से कहते हैं कि जैविक खेती ही भारत की सबसे उत्कृष्ट कृषि पद्धति है, जो हर गांव को आत्मनिर्भर बना सकती है।

संपर्क सूत्र: सोनूराम ध्रुव – 8839249457