Katni: 12 साल में 1 करोड़ पौधे लगे, फिर भी डिवाइडर खाली क्यों?


मध्य प्रदेश का कटनी जिला पिछले 12 वर्षों से एक बड़े पौधारोपण अभियान का केंद्र बना हुआ है, जिसमें सरकारी रिकॉर्ड के अनुसार 1 करोड़ 1 लाख 70 हजार 817 पौधे रोपे जाने का दावा किया गया है। हालांकि, इन भारी-भरकम आंकड़ों और खर्च की गई करोड़ों की राशि के बावजूद, शहर की सड़कों, डिवाइडर…

कटनी में कागजों पर हरियाली: 12 वर्षों में 1 करोड़ से अधिक पौधे लगाने के दावे, जमीनी हकीकत पर उठे सवाल

मध्य प्रदेश का कटनी जिला पिछले 12 वर्षों से एक बड़े पौधारोपण अभियान का केंद्र बना हुआ है, जिसमें सरकारी रिकॉर्ड के अनुसार 1 करोड़ 1 लाख 70 हजार 817 पौधे रोपे जाने का दावा किया गया है। हालांकि, इन भारी-भरकम आंकड़ों और खर्च की गई करोड़ों की राशि के बावजूद, शहर की सड़कों, डिवाइडर और सरकारी हरित परियोजनाओं की स्थिति इन दावों की पोल खोल रही है। शहर में धूल की बढ़ती समस्या और सूने पड़े डिवाइडर इस बात का प्रमाण हैं कि लाखों पौधे लगाने के सरकारी लक्ष्य का लाभ धरातल पर नजर नहीं आ रहा है।

परियोजनाओं की विफलता: सरकारी दावों और हकीकत में अंतर

जिले की कई प्रमुख हरित परियोजनाएं अपेक्षित परिणाम देने में विफल रही हैं। उदाहरण के तौर पर, रोशननगर स्थित अटल निकुंज और उमरियापान के पास करौंदी में स्थित भारत के भौगोलिक केंद्र को पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करने की योजनाएं अधूरी हैं। इन स्थानों पर लाखों रुपये खर्च करने के बाद भी पर्याप्त हरियाली विकसित नहीं हो सकी है। इसी तरह, गुलवारा नगर वन और शहर के मुख्य मार्गों के डिवाइडर भी रखरखाव के अभाव में बदहाल हैं। कई जगहों पर लगाए गए पौधे सूख चुके हैं, जबकि सुरक्षा के लिए लगाई गई रेलिंग भी या तो क्षतिग्रस्त हो गई है या चोरी हो गई है।

पौधारोपण का 12 वर्षों का आधिकारिक डेटा

वन विभाग के आंकड़ों के अनुसार, पिछले एक दशक से अधिक समय में पौधारोपण के लक्ष्यों में लगातार वृद्धि हुई है:

  • 2016-2020: इस अवधि में औसतन 4 से 9 लाख पौधे प्रतिवर्ष लगाने का दावा किया गया।
  • 2021: 95 हजार 800 पौधे।
  • 2022-2027: इन वर्षों में लक्ष्य को तेजी से बढ़ाते हुए 10 लाख से 15 लाख प्रतिवर्ष तक ले जाया गया।

कुल मिलाकर, वर्ष 2016 से 2027 के बीच 1.01 करोड़ से अधिक पौधे लगाने का दावा सरकारी फाइलों में दर्ज है, लेकिन इनका सर्वाइवल ऑडिट सार्वजनिक न होने से इन आंकड़ों की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं।

पर्यावरणविदों का सुझाव: संख्या नहीं, सर्वाइवल रेट पर हो जोर

पर्यावरण विशेषज्ञों का मानना है कि पौधारोपण की सफलता का पैमाना लगाए गए पौधों की संख्या नहीं, बल्कि उनके जीवित रहने की दर (सर्वाइवल रेट) होनी चाहिए। वर्तमान में लगाए गए पौधों में से मात्र 20 से 25 प्रतिशत ही पेड़ बनने की स्थिति तक पहुंच पाते हैं। विशेषज्ञों ने निम्नलिखित सुधारों का सुझाव दिया है:

  • प्रत्येक पौधे की जियो-टैगिंग अनिवार्य की जाए।
  • पौधों के लिए नियमित सिंचाई और सुरक्षा का पुख्ता इंतजाम हो।
  • कम से कम तीन से पांच वर्ष तक पौधों का रखरखाव सुनिश्चित किया जाए।
  • हर साल लगाए गए पौधों का सार्वजनिक रूप से सर्वाइवल ऑडिट पेश किया जाए।

अधिकारियों का पक्ष

इस मामले पर डीएफओ गर्वित गंगवार ने स्पष्ट किया है कि इस वर्ष के 13 लाख 90 हजार 530 पौधों के लक्ष्य में से लगभग 60 प्रतिशत कार्य पूरा कर लिया गया है। वहीं, नगर निगम आयुक्त तपस्या परिहार ने आश्वासन दिया है कि चाका से पीरबाबा तक के डिवाइडरों को फिर से हरा-भरा बनाया जाएगा और पौधों की सुरक्षा के लिए विशेष व्यवस्था की जाएगी। यदि समय रहते इन पौधों का संरक्षण नहीं किया गया, तो पर्यावरण संतुलन और भूजल संरक्षण की दिशा में किया जा रहा यह निवेश केवल कागजी बनकर रह जाएगा।


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