मध्य प्रदेश मेडिकल यूनिवर्सिटी के विभाजन पर बढ़ा सियासी और कानूनी विवाद
मध्य प्रदेश सरकार द्वारा जबलपुर स्थित मध्य प्रदेश आयुर्विज्ञान विश्वविद्यालय (Medical University) को विभाजित कर उज्जैन में ‘महर्षि सुश्रुत आयुर्विज्ञान विश्वविद्यालय’ स्थापित करने के निर्णय ने प्रदेश में एक नई बहस छेड़ दी है। राज्य सरकार द्वारा विधानसभा में इस संशोधन विधेयक को पारित करने के तुरंत बाद, जबलपुर के नागरिक उपभोक्ता मंच ने इसे भेदभावपूर्ण करार देते हुए राज्यपाल डॉ. नवनीत कोठारी को पत्र लिखकर इस पर रोक लगाने की मांग की है। मंच ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि यदि सरकार ने अपना फैसला वापस नहीं लिया, तो इस मामले को उच्च न्यायालय में चुनौती दी जाएगी। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के इस निर्णय को लेकर न केवल कानूनी पेच फंसते दिख रहे हैं, बल्कि विपक्षी दलों ने भी इसे क्षेत्रवाद से जोड़कर सरकार को घेरना शुरू कर दिया है।
विभाजन का गणित: जबलपुर की शैक्षणिक साख पर संकट
नागरिक उपभोक्ता मंच के अध्यक्ष डॉ. पीजी नाजपांडे ने विश्वविद्यालय के बंटवारे में बरती गई असमानता पर गंभीर सवाल उठाए हैं। उनके अनुसार, यह विभाजन केवल प्रशासनिक नहीं, बल्कि शैक्षणिक ढांचे को कमजोर करने वाला है। आंकड़ों के अनुसार:
- असंतुलित कार्यक्षेत्र: उज्जैन विश्वविद्यालय के अधिकार क्षेत्र में 6 संभागों के 31 जिले आएंगे, जबकि जबलपुर के पास केवल 4 संभागों के 24 जिले ही रह जाएंगे।
- कॉलेजों का वितरण: प्रदेश के कुल 85 मेडिकल कॉलेजों में से 60 कॉलेज उज्जैन के अधीन होंगे, जबकि जबलपुर में मात्र 15 कॉलेज शेष रह जाएंगे।
- छात्रों की संख्या: वर्तमान में 16,000 छात्रों की क्षमता वाली इस यूनिवर्सिटी में से 14,000 छात्र उज्जैन में और केवल 2,000 छात्र जबलपुर में अध्ययन करेंगे।
विशेषज्ञों का मानना है कि छात्रों और कॉलेजों की संख्या में भारी कटौती से जबलपुर स्थित मेडिकल यूनिवर्सिटी का शैक्षणिक स्तर और राष्ट्रीय पहचान बुरी तरह प्रभावित होगी। मंच का तर्क है कि यह निर्णय भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 का सीधा उल्लंघन है, जो समानता और मनमानी के विरुद्ध संरक्षण प्रदान करता है। सुप्रीम कोर्ट के पूर्व निर्देशों का हवाला देते हुए मंच ने इसे सरकार की एकतरफा कार्रवाई बताया है।
विपक्ष का हमला: ‘मुख्यमंत्री पूरे प्रदेश के हैं, केवल उज्जैन के नहीं’
इस मुद्दे पर राजनीतिक बयानबाजी भी तेज हो गई है। जबलपुर दौरे पर पहुंचे कांग्रेस विधायक जयवर्धन सिंह ने सरकार की कार्यप्रणाली पर कड़े प्रहार किए। उन्होंने कहा कि उज्जैन का विकास करना स्वागत योग्य है, लेकिन मुख्यमंत्री को यह नहीं भूलना चाहिए कि उनका दायित्व पूरे मध्य प्रदेश के प्रति है। जयवर्धन सिंह ने आरोप लगाया कि अपने कार्यकाल के ढाई वर्षों में मुख्यमंत्री ने जबलपुर के लिए कोई ठोस नीति नहीं बनाई है। उन्होंने सरकार को सलाह दी कि वे केवल एक शहर को प्राथमिकता देने के बजाय पूरे प्रदेश के समान विकास पर ध्यान दें।
फिलहाल, यह मामला अब कानूनी गलियारों में जाने की तैयारी में है। जहां एक ओर सरकार इसे विकेंद्रीकरण और शिक्षा व्यवस्था में सुधार का नाम दे रही है, वहीं दूसरी ओर जबलपुर के नागरिक और प्रबुद्ध वर्ग इसे ‘संस्कारधानी के साथ अन्याय’ मानकर सड़कों से लेकर अदालत तक संघर्ष करने के मूड में है।
