मध्य प्रदेश में बाघों की बढ़ती संख्या के साथ गहराया संकट: सिकुड़ते जंगल और प्रबंधन की खामियों से बढ़ रहा खतरा
टाइगर स्टेट का गौरव हासिल करने वाले मध्य प्रदेश में बाघों की बढ़ती संख्या अब एक बड़ी चुनौती बनती जा रही है। एक ओर प्रदेश में बाघों की संख्या 1,000 से 1,100 के पार पहुंचने का अनुमान है, वहीं दूसरी ओर लगातार सिकुड़ते जंगल और वन्य-प्राणी प्रबंधन में खामियों ने बाघों के अस्तित्व पर संकट के बादल खड़े कर दिए हैं। वर्तमान स्थिति यह है कि टाइगर रिजर्व में बाघों की संख्या उनकी धारण क्षमता (कैपेसिटी) से अधिक हो गई है, जिसके चलते आपसी संघर्ष और शहरी इलाकों की ओर बाघों का रुख बढ़ रहा है।
आंकड़ों में तब्दील होती चिंता
वन्यजीव विशेषज्ञों और सरकारी आंकड़ों के अनुसार, पिछली गणना में प्रदेश में बाघों की संख्या 785 थी, जो अब तेजी से बढ़ रही है। हालांकि, यह वृद्धि वन्यजीव संरक्षण की दृष्टि से सकारात्मक मानी जाती है, लेकिन प्रबंधन के अभाव में यह जानलेवा साबित हो रही है। इस वर्ष के शुरुआती सात महीनों में ही 41 बाघों की मौत हो चुकी है, जिनमें से 15 बाघों की जान आपसी संघर्ष (टेरिटोरियल फाइट) के कारण गई। इतना ही नहीं, भोपाल जैसे शहरी सीमा क्षेत्रों में भी बाघों की मौजूदगी और मूवमेंट में बीते दो सालों में भारी बढ़ोतरी दर्ज की गई है।
विशेषज्ञों की राय और समाधान
टाइगर एक्सपर्ट अजय दुबे का मानना है कि प्रदेश में बाघों को समायोजित करने के लिए अभी भी बेहतर विकल्प मौजूद हैं, बशर्ते वन प्रबंधन को दुरुस्त किया जाए। उन्होंने कहा:
- ओंकारेश्वर नेशनल पार्क: 600 वर्ग किलोमीटर का यह क्षेत्र बाघों के पुनर्वास के लिए सुरक्षित है।
- नौरादेही टाइगर रिजर्व: यह प्रदेश का सबसे बड़ा रिजर्व है, जहां क्षमता के मुकाबले बाघों की संख्या बेहद कम है। ग्रामीणों का विस्थापन न हो पाना यहां मुख्य बाधा है।
- सतपुड़ा और संजय टाइगर रिजर्व: इन क्षेत्रों में भी बेहतर हैबिटेट मैनेजमेंट के जरिए बाघों को शिफ्ट किया जा सकता है।
राजनीतिक घमासान
बाघों के संरक्षण और प्रदेश की नीतियों को लेकर सत्ता पक्ष और विपक्ष आमने-सामने हैं। कांग्रेस प्रवक्ता जितेंद्र मिश्रा ने आरोप लगाया कि बाघों की संख्या में वृद्धि सरकार की उपलब्धि नहीं, बल्कि राज्य की अनुकूल भौगोलिक परिस्थितियों का परिणाम है। उन्होंने जंगलों के विनाश और उद्योगपतियों को जमीन आवंटित करने को बाघों के लिए बड़ा खतरा बताया।
वहीं, भाजपा प्रवक्ता सचिन बघेल ने इन दावों को खारिज करते हुए कहा कि 1,100 से अधिक बाघों की मौजूदगी सरकार की सफल संरक्षण नीतियों का प्रमाण है। उन्होंने दावा किया कि सरकार बाघों के लिए सुरक्षित वातावरण विकसित करने और उनके लिए एक मजबूत तंत्र स्थापित करने हेतु लगातार नीतिगत निर्णय ले रही है।
निष्कर्ष
अंतरराष्ट्रीय बाघ दिवस जैसे आयोजनों के बीच यह चिंतन करना आवश्यक है कि क्या केवल बाघों की संख्या बढ़ाना ही पर्याप्त है? यदि वन क्षेत्र का विस्तार नहीं हुआ और प्रबंधन में सुधार नहीं लाया गया, तो ‘टाइगर स्टेट’ का भविष्य संघर्षों से भरा होगा। यह स्पष्ट है कि जल, जंगल और बाघ का पारिस्थितिक संतुलन ही आने वाले कल की सुरक्षा की कुंजी है।
