Surya Dev: रविवार को सूर्य देव को जल चढ़ाने का सही तरीका और नियम

सनातन संस्कृति में रविवार का दिन साक्षात देव स्वरूप सूर्य नारायण को समर्पित है। शास्त्रों के अनुसार, सूर्य देव ही एकमात्र ऐसे देवता हैं जो प्रतिदिन हमें प्रत्यक्ष दर्शन देते हैं। रविवार के दिन विधि-विधान से सूर्य देव की पूजा, व्रत और मंत्रों का जाप करने से व्यक्ति को आरोग्यता, समाज में मान-सम्मान और सुख-समृद्धि…

सूर्य उपासना का महत्व और रविवार का विशेष संयोग

सनातन संस्कृति में रविवार का दिन साक्षात देव स्वरूप सूर्य नारायण को समर्पित है। शास्त्रों के अनुसार, सूर्य देव ही एकमात्र ऐसे देवता हैं जो प्रतिदिन हमें प्रत्यक्ष दर्शन देते हैं। रविवार के दिन विधि-विधान से सूर्य देव की पूजा, व्रत और मंत्रों का जाप करने से व्यक्ति को आरोग्यता, समाज में मान-सम्मान और सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन आदित्य हृदय स्तोत्र का पाठ करना अत्यंत प्रभावशाली माना गया है।

शास्त्रों में सूर्य देव को प्रसन्न करने के लिए जल अर्घ्य देने की एक विशेष प्रक्रिया निर्धारित की गई है। कई बार जानकारी के अभाव में भक्त अनजाने में कुछ ऐसी गलतियां कर बैठते हैं, जिससे पूजा का पूर्ण फल प्राप्त नहीं हो पाता। आइए जानते हैं कि सूर्य देव की पूजा और उन्हें अर्घ्य देने का सही तरीका क्या है और किन सावधानियों का पालन करना अनिवार्य है।

सूर्य देव को अर्घ्य देने की शास्त्रसम्मत विधि

सूर्य देव को जल अर्पित करने के लिए तांबे के लोटे का ही प्रयोग करना चाहिए, क्योंकि तांबा सूर्य की ऊर्जा का संवाहक माना जाता है। जल देने की सही प्रक्रिया इस प्रकार है:

  • तांबे के पात्र में शुद्ध जल भरें और उसमें लाल चंदन, लाल पुष्प, कुमकुम और अक्षत (चावल) मिलाएं।
  • लोटे को दोनों हाथों से अपने सिर के ऊपर उठाएं और जल की धारा को धीरे-धीरे अर्पित करें।
  • जल की गिरती हुई धारा के बीच से सूर्य देव के दर्शन करना शुभ माना जाता है।
  • अर्घ्य देते समय ‘ॐ घृणि सूर्याय नमः’ या ‘ॐ सूर्याय नमः’ मंत्र का निरंतर जाप करें।
  • अर्घ्य देने के पश्चात आदित्य हृदय स्तोत्र का पाठ करना विशेष फलदायी होता है।

जल अर्पित करते समय बरतें ये सावधानियां

सूर्य पूजा के दौरान कुछ नियमों का पालन करना बहुत आवश्यक है, अन्यथा पूजा निष्फल हो सकती है:

नियम सावधानी
पात्र का चुनाव कभी भी स्टील, कांच या प्लास्टिक के बर्तन का उपयोग न करें।
समय का चयन दोपहर के समय जल न चढ़ाएं, सूर्योदय के तुरंत बाद का समय सबसे उत्तम है।
दिशा का ध्यान हमेशा पूर्व दिशा की ओर मुख करके ही अर्घ्य दें।
पवित्रता स्नान के बाद स्वच्छ वस्त्र धारण करके ही पूजा करें।

इसके अलावा, विशेष रूप से ध्यान रखें कि अर्घ्य देते समय जल की धारा आपके पैरों पर नहीं गिरनी चाहिए। यदि जमीन पर जल गिरता है, तो उसे एक पात्र में एकत्र करें और बाद में किसी गमले या पवित्र स्थान पर डाल दें।

Disclaimer: इस लेख में दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं और धार्मिक ग्रंथों पर आधारित है। इसकी पुष्टि टीवी9 भारतवर्ष नहीं करता है।

लेखक: वरुण कुमार

वरुण कुमार पत्रकारिता के क्षेत्र में पिछले पांच वर्षों से सक्रिय हैं। माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय से मास कम्युनिकेशन की डिग्री प्राप्त करने के बाद, उन्होंने प्रभासाक्षी और एबीपी न्यूज जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों के साथ काम किया है। वर्तमान में वे TV9 डिजिटल की धर्म टीम के साथ जुड़े हुए हैं।


Exit mobile version