Dhar: 1.90 करोड़ खर्च के बाद भी सूखे वन विभाग के पौधे, लापरवाही उजागर

मध्य प्रदेश के धार जिले के अंतर्गत आने वाले सरदारपुर वन परिक्षेत्र में पर्यावरण संरक्षण के नाम पर किए गए दावे अब खोखले साबित हो रहे हैं। कौद बीट के ग्राम शेरगढ़ में मेट्रो रेल परियोजना के तहत काटे गए पेड़ों की भरपाई के लिए जो वृक्षारोपण किया गया था, वह अब पूरी तरह से…

धार में करोड़ों का वृक्षारोपण अभियान सवालों के घेरे में: सूख गए हजारों पौधे

मध्य प्रदेश के धार जिले के अंतर्गत आने वाले सरदारपुर वन परिक्षेत्र में पर्यावरण संरक्षण के नाम पर किए गए दावे अब खोखले साबित हो रहे हैं। कौद बीट के ग्राम शेरगढ़ में मेट्रो रेल परियोजना के तहत काटे गए पेड़ों की भरपाई के लिए जो वृक्षारोपण किया गया था, वह अब पूरी तरह से सवालों के घेरे में आ गया है। महज तीन महीने पहले किए गए इस बड़े वृक्षारोपण अभियान में लगाए गए हजारों पौधे अब या तो सूख चुके हैं या फिर उनका नामोनिशान तक मिट गया है।

1.91 करोड़ का खर्च और बदहाल स्थिति

सरकारी आंकड़ों के अनुसार, इस परियोजना के तहत 30.178 हेक्टेयर भूमि पर 30,178 पौधे रोपे गए थे। इस पूरे अभियान पर सरकार ने 1 करोड़ 91 लाख 77 हजार रुपए की भारी-भरकम राशि खर्च की थी। उद्देश्य स्पष्ट था—विकास कार्यों के चलते काटे गए पेड़ों की भरपाई करना और क्षेत्र में हरियाली का विस्तार करना। हालांकि, वर्तमान स्थिति यह है कि पौधारोपण स्थल पर केवल सूखे डंठल ही नजर आ रहे हैं, जो विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगा रहे हैं।

विवरण आंकड़े
कुल क्षेत्रफल 30.178 हेक्टेयर
पौधों की संख्या 30,178
कुल व्यय 1,91,77,000 रुपए

देखरेख में घोर लापरवाही का आरोप

विशेषज्ञों का मानना है कि वृक्षारोपण केवल गड्ढे खोदकर पौधे लगाने की प्रक्रिया नहीं है, बल्कि यह निरंतर देखभाल की मांग करता है। इस मामले में प्रमुख बिंदु निम्नलिखित हैं:

  • नियमित सिंचाई का अभाव: शुरुआती तीन महीनों में ही पौधों का सूख जाना जल प्रबंधन में विफलता को दर्शाता है।
  • निगरानी की कमी: कई स्थानों पर पौधों का अस्तित्व ही खत्म हो चुका है, जो सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल उठाता है।
  • जवाबदेही का संकट: लाखों रुपए खर्च होने के बावजूद पौधों के जीवित रहने की दर बेहद निराशाजनक है।

जिम्मेदारों की चुप्पी पर उठे सवाल

सरकारी योजनाओं की सफलता का पैमाना केवल पौधे लगाने तक सीमित नहीं होता, बल्कि उनकी उत्तरजीविता दर (Survival Rate) पर निर्भर करता है। शेरगढ़ का यह मामला स्पष्ट करता है कि यदि समय रहते निगरानी और रखरखाव नहीं किया गया, तो पर्यावरण के नाम पर खर्च किया गया करोड़ों का बजट पूरी तरह व्यर्थ हो जाएगा। इस गंभीर मामले पर अपना पक्ष जानने के लिए जब सरदारपुर वन परिक्षेत्र के रेंजर शैलेंद्र सोलंकी से संपर्क करने का प्रयास किया गया, तो उनकी ओर से कोई प्रतिक्रिया नहीं मिल सकी। स्थानीय स्तर पर अब इस पूरे मामले की निष्पक्ष जांच की मांग उठने लगी है।


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