खंडवा में गुरु पूर्णिमा: दादाजी धाम में उमड़ा आस्था का सैलाब, दो लाख से अधिक भक्तों ने किए दर्शन
मध्य प्रदेश के खंडवा स्थित प्रसिद्ध श्री दादाजी धूनीवाले मंदिर में गुरु पूर्णिमा का पर्व श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जा रहा है। तीन दिवसीय महोत्सव के मुख्य दिन बुधवार को देश भर से आए लाखों भक्तों ने दादाजी की समाधि पर मत्था टेका। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, दोपहर तक दो लाख से अधिक श्रद्धालु दर्शन कर चुके हैं। सुरक्षा और व्यवस्था बनाए रखने के लिए मंदिर परिसर में 850 सुरक्षाकर्मी और 2,000 सेवादार तैनात किए गए हैं।
अन्नपूर्णा का स्वरूप खंडवा, नि:शुल्क सेवा की अनोखी परंपरा
खंडवा का दादाजी धाम अपनी अनूठी परंपराओं के लिए देशभर में विख्यात है। यहाँ आने वाले भक्तों को अपनी जेब से खर्च करने की आवश्यकता नहीं पड़ती। शहर भर में फैले 400 से अधिक स्टॉल्स पर 100 से भी ज्यादा प्रकार के व्यंजनों का वितरण किया जा रहा है। भक्तों के स्वागत के लिए जगह-जगह भंडारे आयोजित किए गए हैं, जहाँ सेवा का भाव सर्वोपरि है। आज रात 8 बजे 108 दीपों की महाआरती के साथ महोत्सव का मुख्य अनुष्ठान संपन्न होगा, जिसमें हजारों की संख्या में भक्तों के शामिल होने की संभावना है।
गुरु-शिष्य परंपरा का केंद्र
दादाजी धूनीवाले एक अवधूत संत थे, जो मां नर्मदा के अनन्य भक्त थे। उन्होंने सदैव धूनी रमाकर लोक कल्याण का मार्ग दिखाया। उनके जीवन और समाधि से जुड़ी प्रमुख बातें इस प्रकार हैं:
- संत परंपरा: दादाजी धूनीवाले ने वर्ष 1930 में समाधि ली थी, जिसके बाद उनके शिष्य छोटे दादाजी ने 1942 में समाधि ली।
- आस्था की पदयात्रा: गुरु के प्रति समर्पण का भाव ऐसा है कि कई भक्त सैकड़ों किलोमीटर की पैदल यात्रा कर हाथों में निशान (झंडा) लेकर खंडवा पहुँचते हैं।
- अध्यात्म का केंद्र: यहाँ गुरु-शिष्य की परंपरा को जीवंत देखने के लिए देश के विभिन्न राज्यों से श्रद्धालु हर साल जुटते हैं।
भक्तों का मानना है कि दादाजी के दर पर आने से जीवन के कष्ट दूर हो जाते हैं। पैदल यात्रा कर यहाँ पहुँचे श्रद्धालुओं के लिए ‘भज लो दादाजी का नाम’ का उद्घोष ही उनकी पूरी थकान मिटाने के लिए पर्याप्त होता है। यह पर्व न केवल आध्यात्मिक ऊर्जा का संचार करता है, बल्कि खंडवा शहर को एक विशाल परिवार के रूप में एकजुट भी करता है।
