शाजापुर में हिरणों का आतंक: किसानों की मेहनत पर फिर रहा पानी, प्रशासन से लगाई गुहार
मध्य प्रदेश के शाजापुर जिले के ग्रामीण इलाकों में इन दिनों हिरणों का झुंड किसानों के लिए सिरदर्द बना हुआ है। खेतों में बड़ी संख्या में पहुंच रहे हिरण न केवल तैयार फसलों को चट कर रहे हैं, बल्कि उन्हें पैरों से रौंदकर भारी बर्बादी कर रहे हैं। अपनी मेहनत को आंखों के सामने बर्बाद होते देख किसान अब लाचार हैं और वन विभाग व स्थानीय प्रशासन से इस समस्या का तत्काल समाधान करने की मांग कर रहे हैं।
स्थानीय किसानों के अनुसार, शाम ढलते ही हिरणों के झुंड खेतों में डेरा डाल लेते हैं। सोशल मीडिया पर भी कई ऐसे वीडियो वायरल हो रहे हैं, जिनमें दर्जनों की संख्या में हिरण खेतों में दौड़ते और फसलों को नुकसान पहुंचाते देखे जा सकते हैं। बेरछा के रहने वाले किसान राकेश ने बताया कि रोजाना रात के अंधेरे में हिरणों का दल खेतों में घुस आता है। ये न सिर्फ फसल चरते हैं, बल्कि पौधों को तोड़कर उन्हें पूरी तरह नष्ट कर देते हैं, जिससे किसानों को हर दिन भारी आर्थिक क्षति का सामना करना पड़ रहा है।
बीते साल की गई थी बड़ी कार्रवाई, फिर भी समस्या बरकरार
वन विभाग ने पिछले साल इस समस्या से निपटने के लिए एक बड़ा अभियान चलाया था। आंकड़ों पर नजर डालें तो विभाग ने जिले के अलग-अलग हिस्सों से 913 से अधिक हिरणों और नीलगायों को रेस्क्यू कर सुरक्षित अभयारण्यों में शिफ्ट किया था। इसका मुख्य उद्देश्य किसानों को राहत पहुंचाना था, लेकिन धरातल पर स्थिति अभी भी चिंताजनक बनी हुई है।
| विवरण | आंकड़े/स्थिति |
|---|---|
| पिछले वर्ष शिफ्ट किए गए जानवर | 913 से अधिक (हिरण और नीलगाय) |
| वर्तमान स्थिति | कई क्षेत्रों में फिर से हिरणों की बढ़ती संख्या |
| मुख्य समस्या | फसल चरना और पौधों को रौंदना |
किसानों की मांग: स्थायी समाधान के लिए उठाए जाएं ठोस कदम
प्रभावित किसानों का कहना है कि प्रशासन द्वारा की गई पिछली कार्रवाई के बावजूद हिरणों की संख्या कम नहीं हुई है। अब किसान सरकार से निम्नलिखित कदम उठाने की मांग कर रहे हैं:
- खेतों की सुरक्षा के लिए वन विभाग द्वारा प्रभावी निगरानी।
- हिरणों को सुरक्षित रूप से अन्यत्र स्थानांतरित करने का फिर से प्रयास।
- फसल नुकसान के लिए उचित मुआवजे का प्रावधान।
- समस्या का ऐसा स्थायी हल निकालना, जिससे भविष्य में किसानों को आर्थिक चोट न पहुंचे।
फिलहाल, शाजापुर के ग्रामीण अपनी फसलों को बचाने के लिए रात भर जागकर पहरा देने को मजबूर हैं। अब देखना यह होगा कि वन विभाग और प्रशासन इस गंभीर समस्या पर क्या रुख अपनाते हैं और किसानों को इस संकट से कब तक निजात मिलती है।
