Interview: पिता की मौत का दर्द, युवराज पाराशर ने बयां की दिल छू लेने वाली कहानी

आज के दौर में जब पारिवारिक मूल्यों और रिश्तों की अहमियत कम होती जा रही है, फिल्म 'गुड़हल' एक आईने की तरह समाज के सामने खड़ी है। माता-पिता और बच्चों के बीच के नाजुक रिश्तों पर आधारित यह फिल्म दर्शकों के दिलों को छू रही है। हाल ही में फिल्म के लेखक, निर्देशक, निर्माता और…

रिश्तों की गहराई और मानवीय संवेदनाओं को बयां करती फिल्म ‘गुड़हल’

आज के दौर में जब पारिवारिक मूल्यों और रिश्तों की अहमियत कम होती जा रही है, फिल्म ‘गुड़हल’ एक आईने की तरह समाज के सामने खड़ी है। माता-पिता और बच्चों के बीच के नाजुक रिश्तों पर आधारित यह फिल्म दर्शकों के दिलों को छू रही है। हाल ही में फिल्म के लेखक, निर्देशक, निर्माता और मुख्य अभिनेता युवराज पाराशर के साथ अभिनेत्री मोना अंबेगांवकर और पूजा सिंह ने एक खास बातचीत में फिल्म के पीछे की प्रेरणा और अपने किरदारों के बारे में खुलकर चर्चा की।

एक निजी दर्द से जन्मी ‘गुड़हल’ की कहानी

युवराज पाराशर ने बताया कि ‘गुड़हल’ को लिखने में उन्हें करीब दो साल का लंबा समय लगा। उन्होंने कहा, “मैंने हमेशा ऐसी कहानियां चुनी हैं जो समाज को आईना दिखाएं। आज हम अपनी भागदौड़ भरी जिंदगी में माता-पिता को अक्सर नजरअंदाज कर देते हैं, जबकि उन्हीं की बदौलत हमारी पहचान है। एक भावुक किस्सा साझा करते हुए युवराज ने बताया कि फिल्म का सबसे इमोशनल सीन उनके दिवंगत पिता की यादों से प्रेरित है। शूटिंग के दौरान जब उन्होंने अपने पिता के खोने का दर्द मोना अंबेगांवकर के साथ साझा किया, तो सेट पर सन्नाटा पसर गया था। वह पल इतना वास्तविक था कि उनकी बहन भी खुद को रोने से नहीं रोक पाईं।”

किरदारों की चुनौती और तैयारी

फिल्म में एक अहम भूमिका निभा रहीं मोना अंबेगांवकर ने अपने सफर के बारे में कहा, “मेरा किरदार एक ऐसी महिला का है जिसका पूरा संसार उसका पति था। पति के निधन के बाद वह पूरी तरह टूट जाती है। हालांकि, मैं निजी जीवन में ऐसी नहीं हूं, लेकिन मैंने इस किरदार के जरिए एक महिला की बेबसी और उसकी छिपी हुई ताकत को दिखाने की कोशिश की है। मेरे लिए रोल की उम्र मायने नहीं रखती, अगर स्क्रिप्ट दमदार हो तो मैं 70-75 साल की महिला का किरदार निभाने में भी गर्व महसूस करती हूं।”

  • पूजा सिंह का अनुभव: पूजा ने बताया कि स्क्रिप्ट पढ़ते ही वह भावुक हो गई थीं। उनके लिए दिग्गज कलाकारों के साथ काम करना किसी सपने के सच होने जैसा था।
  • फिल्म का संदेश: पूजा की मां ने जब फिल्म देखी, तो वह खुद को रोने से नहीं रोक पाईं। उनका मानना है कि ऐसी फिल्में समाज की हकीकत को बयां करती हैं।
  • निर्देशन का सुकून: युवराज के लिए लेखक, निर्देशक और अभिनेता के रूप में निर्देशन की भूमिका सबसे ज्यादा संतोषजनक रही।

इंडस्ट्री का बदलता दौर और सोशल मीडिया का प्रभाव

मौजूदा समय में सोशल मीडिया फॉलोअर्स के आधार पर कास्टिंग को लेकर मोना और युवराज ने अपनी राय स्पष्ट रखी।

कलाकार सोशल मीडिया बनाम टैलेंट पर राय
मोना अंबेगांवकर एक्टर को एक्टिंग करने दें और इन्फ्लुएंसर को इन्फ्लुएंसिंग, दोनों का अपना अलग दायरा है।
युवराज पाराशर सिर्फ फॉलोअर्स देखकर कास्टिंग करना प्रतिभाशाली कलाकारों के साथ अन्याय है।

युवराज का मानना है कि अभिनय एक साधना है जिसे सीखने में वर्षों की मेहनत लगती है। ‘गुड़हल’ केवल एक फिल्म नहीं, बल्कि एक सामाजिक संदेश है जो हमें हमारे जड़ों से जुड़ने और अपनों की कद्र करने की सीख देती है।


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