छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: RTI के तहत जुर्माना लगाने से पहले नोटिस और सुनवाई अनिवार्य
बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने सूचना का अधिकार (RTI) अधिनियम 2005 के तहत एक महत्वपूर्ण कानूनी व्याख्या करते हुए स्पष्ट किया है कि राज्य सूचना आयोग किसी भी लोक सूचना अधिकारी (PIO) पर जुर्माना लगाने से पहले मनमानी नहीं कर सकता। कोर्ट ने अपने आदेश में साफ कहा है कि धारा 20(1) के तहत दंडित करने से पूर्व अधिकारी को अलग से नोटिस जारी करना और अपना पक्ष रखने का उचित अवसर देना अनिवार्य है। केवल अपील की कार्यवाही के दौरान दिए गए नोटिस के आधार पर जुर्माना लगाना कानूनी प्रक्रिया का उल्लंघन है।
यह मामला एक लोक सूचना अधिकारी की याचिका से जुड़ा है, जिसमें उन्होंने छत्तीसगढ़ राज्य सूचना आयोग के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसके तहत उन पर जुर्माना लगाने के साथ-साथ विभागीय कार्रवाई की सिफारिश की गई थी। याचिकाकर्ता का तर्क था कि आयोग ने प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों को दरकिनार करते हुए बिना किसी विशिष्ट नोटिस के सीधे जुर्माना थोप दिया। अदालत ने इस दलील को गंभीरता से लेते हुए कहा कि कानून द्वारा निर्धारित प्रक्रिया का पालन करना हर प्राधिकरण के लिए सर्वोपरि है।
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क्या था पूरा मामला?
मामले की पृष्ठभूमि में एक आवेदक ने कौशल विकास योजना के तहत खरीदी गई अनुपयोगी सामग्री के निस्तारण और नीलामी से संबंधित विस्तृत जानकारी मांगी थी। लोक सूचना अधिकारी ने सूचना को अस्पष्ट और विस्तृत बताते हुए जवाब देने में असमर्थता जताई थी। प्रथम अपीलीय प्राधिकारी द्वारा निर्देश दिए जाने के बावजूद मामला राज्य सूचना आयोग पहुंचा, जहां आयोग ने सुनवाई के दौरान ही लोक सूचना अधिकारी पर जुर्माना लगा दिया था।
हाईकोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणियाँ और निर्देश
- प्रक्रिया का पालन: कोर्ट ने कहा कि अपील के लिए जारी नोटिस और धारा 20(1) के तहत दंड के लिए दिया जाने वाला नोटिस दोनों अलग-अलग हैं।
- सुनवाई का अधिकार: किसी भी लोक सेवक पर जुर्माना लगाने से पहले उसे अपना बचाव प्रस्तुत करने का पूरा मौका मिलना चाहिए।
- आदेश निरस्त: हाईकोर्ट ने राज्य सूचना आयोग द्वारा 6 सितंबर 2022 को पारित जुर्माना लगाने वाले आदेश को कानून की दृष्टि में गलत मानते हुए रद्द कर दिया।
- कानूनी बाध्यता: यदि कोई कानून किसी विशेष प्रक्रिया को तय करता है, तो संबंधित प्राधिकरण उस प्रक्रिया के पालन के लिए पूरी तरह बाध्य है।
जस्टिस अमितेंद्र किशोर प्रसाद की एकल पीठ ने इस मामले में नजीर पेश करते हुए स्पष्ट कर दिया है कि RTI एक्ट के तहत जवाबदेही तय करना महत्वपूर्ण है, लेकिन यह प्रक्रिया कानूनी प्रावधानों के दायरे में ही होनी चाहिए। इस फैसले से भविष्य में सूचना आयोग के समक्ष लंबित मामलों में जवाबदेही और सुनवाई की प्रक्रिया अधिक पारदर्शी और न्यायसंगत होने की उम्मीद है।




