कोटा मेडिकल कॉलेज का बड़ा संकट: किडनी फेल होने से जूझ रही 5 महिलाओं के परिवारों ने दी आत्मदाह की चेतावनी
राजस्थान के कोटा मेडिकल कॉलेज में इलाज के दौरान लापरवाही का एक बेहद गंभीर मामला सामने आया है। अस्पताल में भर्ती पांच महिलाओं की किडनी फेल होने के बाद उनके परिजनों ने सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। पिछले 70 दिनों से अस्पताल में भर्ती इन प्रसूताओं के परिवारों ने न्याय की गुहार लगाते हुए प्रशासन को 48 घंटे का अल्टीमेटम दिया है।
अस्पताल की लापरवाही बनी जान की दुश्मन
परिजनों का आरोप है कि अस्पताल प्रशासन की बड़ी लापरवाही और कथित रूप से खराब या नकली दवाओं के इस्तेमाल के कारण इन महिलाओं की दोनों किडनियां खराब हो गईं। वर्तमान में रागिनी मीणा, आरती चौबदार, पिंकी, सुशीला और धन्नी सुमन अस्पताल में जिंदगी और मौत के बीच झूल रही हैं। हर दूसरे दिन होने वाली डायलिसिस ने इन महिलाओं के साथ-साथ उनके पूरे परिवार को शारीरिक और मानसिक रूप से तोड़कर रख दिया है।
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परिजनों की मांग: या तो इलाज करो या जहर का इंजेक्शन
मरीजों की दयनीय स्थिति को देखते हुए उनके परिवार वाले पूरी तरह हताश हो चुके हैं। धन्नी बाई के पति मोहनलाल ने दर्द बयां करते हुए कहा कि उनकी पत्नी अब डायलिसिस के नाम से ही कांप उठती है। उन्होंने आक्रोश में आकर प्रशासन से मांग की है कि यदि सरकार उनका किडनी ट्रांसप्लांट नहीं करवा सकती, तो उन्हें जहर का इंजेक्शन ही दे दिया जाए।
| प्रमुख मांगें | विवरण |
|---|---|
| किडनी ट्रांसप्लांट | सभी 5 महिलाओं का तत्काल ट्रांसप्लांट करवाया जाए। |
| अल्टीमेटम | 48 घंटे के भीतर सकारात्मक निर्णय न होने पर डायलिसिस बंद करने की चेतावनी। |
| न्याय | लापरवाही बरतने वाले दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई। |
48 घंटे का अल्टीमेटम और भविष्य का संकट
परिजनों ने जिला कलेक्टर को सौंपे गए ज्ञापन में साफ कर दिया है कि यदि अगले 48 घंटों में उनके मरीजों के किडनी ट्रांसप्लांट की प्रक्रिया शुरू नहीं की गई, तो वे डायलिसिस करवाना बंद कर देंगे। परिजनों का कहना है कि वे अब इस दर्दनाक प्रक्रिया को और अधिक नहीं झेल सकते।
- घटना का समय: 4 मई से 8 मई के बीच प्रसूताएं अस्पताल में भर्ती हुई थीं।
- वर्तमान स्थिति: पिछले 70 दिनों से लगातार डायलिसिस पर निर्भर।
- परिवारों का रुख: इलाज न मिलने पर अस्पताल में ही दम तोड़ने की चेतावनी।
कोटा अस्पताल पर पहले भी उठ चुके हैं सवाल
कोटा के सरकारी अस्पताल में यह पहली बार नहीं है जब लापरवाही की खबरें सामने आई हैं। इससे पहले भी सीलन भरे वार्डों में भर्ती महिलाओं की मौत, नवजात शिशुओं की मृत्यु और दवाओं के नमूनों को लेकर अस्पताल प्रबंधन सवालों के घेरे में रहा है। इन घटनाओं ने सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं की पोल खोलकर रख दी है, जहां मरीज इलाज कराने आते हैं लेकिन उन्हें जान का जोखिम उठाना पड़ रहा है।










