मध्य प्रदेश: केन-बेतवा लिंक परियोजना के विस्थापितों का ‘चिता आंदोलन’ तेज, प्रशासन पर गंभीर आरोप
मध्य प्रदेश के बुंदेलखंड क्षेत्र में बांध परियोजनाओं और केन-बेतवा लिंक प्रोजेक्ट से विस्थापित हुए सैकड़ों लोग पिछले कई दिनों से अपने हक की लड़ाई लड़ रहे हैं। छतरपुर जिले के कूपी गांव में बैराना नदी के तट पर चल रहा यह प्रदर्शन अब उग्र रूप ले चुका है। विस्थापितों ने ‘न्याय दो या मार दो’ का नारा देते हुए सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। 3 जुलाई से शुरू हुआ यह धरना अब एक बड़े जन-आंदोलन में तब्दील हो गया है, जहां आंदोलनकारी लकड़ी की प्रतीकात्मक चिताओं पर लेटने को मजबूर हैं।
आंदोलन का केंद्र: बैराना नदी का किनारा
छतरपुर मुख्यालय से लगभग 70 किलोमीटर दूर कूपी गांव में स्थिति बेहद तनावपूर्ण है। यहां करीब 400 से अधिक विस्थापित, जिनमें महिलाएं और बच्चे भी शामिल हैं, भीषण बारिश और प्रतिकूल परिस्थितियों के बावजूद डटे हुए हैं। आंदोलन का नेतृत्व कर रहे अमित भटनागर 6 जुलाई से आमरण अनशन पर हैं। प्रदर्शनकारी महिलाएं अपने चेहरों पर मिट्टी मलकर मौन विरोध दर्ज करा रही हैं, जो सरकार की बेरुखी के खिलाफ उनके आक्रोश को दर्शाता है।
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विस्थापितों की प्रमुख मांगें और समस्याएं
विभिन्न परियोजनाओं से प्रभावित लोगों ने प्रशासन पर वादाखिलाफी और दमन का आरोप लगाया है। प्रमुख समस्याएं निम्नलिखित हैं:
- मुआवजे में भेदभाव: स्थानीय किसानों को केवल 3.68 लाख रुपये प्रति एकड़ मिल रहे हैं, जबकि बाहरी लोगों को 54 लाख रुपये तक का मुआवजा देने के आरोप हैं।
- फर्जी मुकदमे: विरोध करने पर प्रशासन द्वारा ग्रामीणों पर झूठे मुकदमे दर्ज किए जा रहे हैं।
- पुनर्वास का अभाव: कई परिवारों को न तो जमीन का उचित मुआवजा मिला है और न ही रहने के लिए छत।
- अस्पष्टता: कई गांवों को डूब क्षेत्र में होने के बावजूद आधिकारिक घोषणा नहीं की जा रही, जिससे ग्रामीण असमंजस में हैं।
विभिन्न परियोजनाओं से प्रभावितों का दर्द
| परियोजना | मुख्य शिकायत |
|---|---|
| रुन्झ बांध | प्रशासन द्वारा झूठे मुकदमे दर्ज करना और बिना ग्राम सभा की अनुमति के काम शुरू करना। |
| नेगुवां सिंचाई | 60% किसानों को दो साल बाद भी मुआवजा न मिलना और ब्याज का भुगतान न करना। |
| मझगवां परियोजना | सर्वे के बावजूद मुआवजा न देना और गांव को डूब क्षेत्र से बाहर न घोषित करना। |
प्रशासन का रुख: क्या कहता है छतरपुर जिला प्रशासन?
इस पूरे मामले पर छतरपुर के कलेक्टर पार्थ जायसवाल का कहना है कि धरने पर बैठे अधिकांश लोग पन्ना जिले की परियोजनाओं से प्रभावित हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि, “इन मामलों का निराकरण पन्ना जिला प्रशासन को करना है। हमारी ओर से पन्ना प्रशासन को सूचित किया गया है और उन्होंने आंदोलनकारियों से बातचीत भी की है।” कलेक्टर ने यह भी जानकारी दी कि रुन्झ और मझगवां परियोजनाओं के लिए पुनर्वास पैकेज को 5 लाख से बढ़ाकर 12.5 लाख रुपये कर दिया गया है।
निष्कर्ष: भविष्य की चुनौती
विकास की वेदी पर अपनी जमीन और आजीविका खोने वाले ये आदिवासी और किसान अब आर-पार की लड़ाई के मूड में हैं। अमित भटनागर का कहना है कि जब तक उनकी मांगों को मान नहीं लिया जाता और फर्जी मुकदमे वापस नहीं लिए जाते, तब तक यह आंदोलन जारी रहेगा। बुंदेलखंड का यह ‘चिता आंदोलन’ न केवल विस्थापितों की पीड़ा को उजागर कर रहा है, बल्कि विकास परियोजनाओं के क्रियान्वयन में पारदर्शिता और संवेदनशीलता की कमी पर भी बड़े सवाल खड़े कर रहा है।










