बणी-ठणी: राजस्थान की ‘मोना लिसा’ और राजा सावंत सिंह की अमर प्रेम कहानी
राजस्थान की कला और संस्कृति के पन्नों में किशनगढ़ शैली का नाम स्वर्ण अक्षरों में दर्ज है। इस शैली को विश्व पटल पर पहचान दिलाने वाली ‘बणी-ठणी’ की पेंटिंग आज भी रहस्य और सौंदर्य का प्रतीक मानी जाती है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि यह विश्व प्रसिद्ध चित्र केवल एक कल्पना नहीं, बल्कि राजा सावंत सिंह और उनकी प्रिय ‘बणी-ठणी’ के बीच पनपे गहरे आध्यात्मिक और प्रेमपूर्ण संबंधों का जीवंत दस्तावेज है?
राजपूताना का वह दरबार, जहां गूंजती थी कृष्ण भक्ति
18वीं सदी का किशनगढ़ राजघराना अन्य रियासतों से बिल्कुल अलग था। जहां उस दौर में तलवारों की खनक सुनाई देती थी, वहीं किशनगढ़ के राजा सावंत सिंह का दरबार कविता, संगीत और कृष्ण भक्ति के सुरों से सराबोर रहता था। राजा सावंत सिंह स्वयं एक उच्च कोटि के कवि थे और ‘नागरी दास’ उपनाम से अपनी रचनाएं लिखा करते थे। उनका मन राजपाट से अधिक ईश्वरीय प्रेम में रमता था, जिसने किशनगढ़ कला शैली के विकास के लिए एक उर्वर जमीन तैयार की।
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दिल्ली से किशनगढ़ तक का सफर
ऐतिहासिक तथ्यों और लोक मान्यताओं के अनुसार, बणी-ठणी को राजा सावंत सिंह की सौतेली मां बंकावतजी ने बहुत कम उम्र में दिल्ली (उस समय के शाहजहानाबाद) से मंगवाया था। महल में आने के बाद उन्हें संगीत, गायन और साहित्य की बारीकियां सिखाई गईं। समय के साथ बणी-ठणी न केवल एक कुशल गायिका बनीं, बल्कि कविता लेखन में भी उन्होंने महारत हासिल कर ली।
राजा और बणी-ठणी का आध्यात्मिक जुड़ाव
किशनगढ़ पूर्व राजपरिवार की सदस्य मीनाक्षी देवी के अनुसार, बणी-ठणी राजा सावंत सिंह की पासवान थीं। उनके बीच का रिश्ता केवल शारीरिक आकर्षण तक सीमित नहीं था, बल्कि वह साहित्यिक और आध्यात्मिक था। दोनों मिलकर कविताएं लिखते थे, जो आज भी वहां के मंदिरों में पूरे भक्ति भाव से गाई जाती हैं।
- नाम: बणी-ठणी (जिन्हें कला जगत में भारत की ‘मोना लिसा’ कहा जाता है)
- साहित्यिक उपनाम: रसिक बिहारी
- राजा का उपनाम: नागरी दास
- कला शैली: किशनगढ़ चित्रकला शैली
एक मुलाकात, जिसने इतिहास रच दिया
कहते हैं कि एक शाम जब महल में बणी-ठणी की सुरीली आवाज गूंजी, तो राजा सावंत सिंह मंत्रमुग्ध हो गए। उनकी आवाज में कृष्ण भक्ति की जो गहराई थी, उसने राजा के हृदय को छू लिया। यहीं से राजा और बणी-ठणी के बीच एक ऐसी अनकही डोर बंधी, जिसने कलाकार निहाल चंद को प्रेरित किया। निहाल चंद ने उन्हीं भावों को रंगों में पिरोकर ‘बणी-ठणी’ का वह कालजयी चित्र बनाया, जो आज भी दुनिया भर के कला प्रेमियों को अपनी ओर खींचता है।
राजा सावंत और बणी-ठणी की यह जुगलबंदी केवल एक प्रेम कहानी नहीं, बल्कि भक्ति और कला का वह संगम है जिसने किशनगढ़ को अमर कर दिया।
(अस्वीकरण: इस लेख को रोचक बनाने के लिए रचनात्मक स्वतंत्रता का उपयोग किया गया है। चित्र और पेंटिंग का श्रेय किशनगढ़ पूर्व राजपरिवार और चित्रकार शहजाद अली शेरानी को जाता है।)
अगले अंक में पढ़ें: ‘नागरी दास’ और ‘रसिक बिहारी’ के भक्ति और प्रेम की अनूठी जुगलबंदी का अगला अध्याय।










