उदयपुर में समान नागरिक संहिता पर जनसुनवाई: नेताओं के बीच तीखी नोकझोंक और हंगामे के बीच सिमटी प्रक्रिया
उदयपुर कलेक्ट्रेट में समान नागरिक संहिता (UCC) के मसौदे पर चर्चा के लिए आयोजित संभागस्तरीय जनसुनवाई के दौरान भारी हंगामा देखने को मिला। प्रारूप समिति के सदस्य और अतिरिक्त महाधिवक्ता बसंतसिंह छाबड़ा की अध्यक्षता में हुई इस बैठक में जनता से अधिक नेताओं और अधिकारियों का जमावड़ा रहा। स्थिति तब और बिगड़ गई जब कांग्रेस शहर जिला अध्यक्ष फतहसिंह राठौड़ ने इसे महज एक औपचारिकता करार देते हुए जनसुनवाई का बहिष्कार कर दिया।
कांग्रेस का बहिष्कार और भाजपा सांसद से हुई तीखी बहस
कांग्रेस नेता फतहसिंह राठौड़ अपने समर्थकों के साथ जनसुनवाई में पहुंचे थे, लेकिन बंद कमरे में हो रही चर्चा पर उन्होंने कड़ी आपत्ति जताई। उन्होंने कहा कि ऐसी महत्वपूर्ण सुनवाई आमजन के बीच होनी चाहिए, न कि बंद कमरों में। इसी मुद्दे पर भाजपा सांसद मन्नालाल रावत और राठौड़ के बीच तीखी बहस हो गई। सांसद रावत ने उन पर आरोप लगाया कि वे किसी का भला नहीं चाहते, जबकि प्रशासन के अधिकारियों ने उन्हें समझाने की कोशिश की, लेकिन राठौड़ सुनवाई छोड़कर बाहर निकल गए।
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आदिवासी मुद्दों पर सांसद और युवा नेता के बीच तकरार
सुनवाई के दौरान माहौल तब और गरमा गया जब भील प्रदेश विद्यार्थी मोर्चा के संयोजक निशाकर सिंह डामोर ने आदिवासी संस्कृति के संरक्षण का मुद्दा उठाया। सांसद मन्नालाल रावत ने डामोर की टिप्पणी पर नाराजगी जताते हुए कहा कि वे आदिवासी समाज का प्रतिनिधित्व नहीं करते। इस पर डामोर ने पलटवार करते हुए कहा कि एक आदिवासी होने के नाते उन्हें समाज की बात रखने का पूरा हक है।
जनसुनवाई की मुख्य बातें और विवाद
| मुद्दा | विवरण |
|---|---|
| जनभागीदारी | प्रचार के अभाव में मात्र 10-15 लोग ही सुझाव देने पहुंचे। |
| कांग्रेस का रुख | बंद कमरे में सुनवाई का विरोध कर बहिष्कार किया। |
| सांसद का सुझाव | UCC से आदिवासियों को बाहर रखने और धर्मांतरित ईसाई-इस्लाम पर इसे लागू करने की वकालत। |
प्रचार-प्रसार में कमी से बेअसर रही जनसुनवाई
जनसुनवाई का सबसे निराशाजनक पहलू यह रहा कि जिला प्रशासन द्वारा किए गए अपर्याप्त प्रचार-प्रसार के कारण आम जनता तक इसकी जानकारी नहीं पहुंच सकी। सभागार में अफसरों और नेताओं की भीड़ तो थी, लेकिन सुझाव देने के लिए आम लोग नदारद दिखे। इस विफलता पर सवाल उठ रहे हैं कि आखिर जिस उद्देश्य के लिए यह प्रक्रिया शुरू की गई थी, क्या वह पूरी तरह से अर्थहीन साबित हुई?
प्रारूप समिति का स्पष्टीकरण
बैठक के दौरान जब बहस ने सांप्रदायिक रूप लेने की कोशिश की, तो अतिरिक्त महाधिवक्ता बसंतसिंह छाबड़ा ने हस्तक्षेप किया। उन्होंने सभी को टोकते हुए कहा कि यह मंच किसी को नीचा दिखाने या हिंदू-मुस्लिम की बहस के लिए नहीं है। उन्होंने स्पष्ट किया कि सभी नागरिकों की पूजा पद्धतियां अलग हो सकती हैं, लेकिन कानून के सामने सभी समान हैं। उन्होंने अपील की कि सभी सुझाव जनहित को ध्यान में रखकर ही दिए जाएं।









