राजनीति के हाशिये पर पहुंचे नेताओं के लिए ‘अयोध्या’ बना वापसी का जरिया
भारतीय सियासत में जब भी कोई संवेदनशील मुद्दा सुर्खियों में आता है, तो उन नेताओं की सक्रियता अचानक बढ़ जाती है, जो लंबे समय से मुख्यधारा से दूर और राजनीतिक रूप से अप्रासंगिक हो चुके हैं। अयोध्या में चढ़ावा चोरी का मामला इसका ताजा उदाहरण बनकर उभरा है। एक तरफ जहां जांच एजेंसियां इस गंभीर मामले की तह तक जाने के लिए मुस्तैद हैं, वहीं दूसरी ओर कुछ ‘आउटडेटेड’ नेता इस मुद्दे को भुनाने में जुट गए हैं। ऐसा लगता है कि इन नेताओं के लिए यह प्रकरण जनहित का मुद्दा कम और खुद को फिर से चर्चा में लाने का एक अवसर अधिक है।
क्या वापसी की छटपटाहट में आस्था का हो रहा सौदा?
राजनीति का एक कटु सत्य है कि ‘जो दिखता है, वही बिकता है’। जो नेता बीते कई चुनावों में जनता द्वारा नकारे जा चुके हैं या अपनी ही पार्टियों में दरकिनार कर दिए गए हैं, उनके लिए अयोध्या जैसा बड़ा नाम एक ‘लाउडस्पीकर’ की तरह काम करता है। टीवी डिबेट्स में अपनी जगह सुरक्षित करने और सोशल मीडिया पर ट्रेंड में बने रहने के लिए ये नेता इस मामले पर लगातार विवादास्पद बयान दे रहे हैं। ये नेता आस्थावान जनता की भावनाओं का लाभ उठाने की कोशिश में यह भी भूल जाते हैं कि उनके बयान करोड़ों सनातनियों की संवेदनाओं को ठेस पहुंचा रहे हैं।
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जमीनी हकीकत बनाम सियासी नौटंकी
यह जगजाहिर है कि जब कोई गंभीर घटना होती है, तो संबंधित प्रशासन और जिम्मेदार संगठन कानूनी कार्रवाई में जुट जाते हैं। अयोध्या मामले में योगी सरकार द्वारा गठित एसआईटी जांच कर रही है, कई आरोपी सलाखों के पीछे हैं और मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा है। लेकिन, हाशिये पर मौजूद इन नेताओं का अंदाज निराला है। इनका जोर समाधान से अधिक धरने-प्रदर्शन की तस्वीरों, प्रेस कॉन्फ्रेंस और सोशल मीडिया पर बयानों की बौछार करने पर है। राम मंदिर से जुड़ी करोड़ों लोगों की आस्था को राजनीति के चश्मे से देखना जनभावनाओं के साथ खिलवाड़ के अलावा और कुछ नहीं है।
आज का जागरूक मतदाता सब कुछ देख और समझ रहा है। जो नेता जनता के सुख-दुख में कभी नजर नहीं आते और राष्ट्रहित के गंभीर मुद्दों पर चुप्पी साधे रहते हैं, वे अचानक किसी विवाद के दौरान कैमरों के सामने क्यों सक्रिय हो जाते हैं, इसका जवाब जनता बखूबी जानती है।
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चढ़ावा चोरी का मामला निश्चित रूप से एक कानूनन अपराध है और दोषियों को सख्त सजा मिलनी ही चाहिए। लेकिन इस मुद्दे की आड़ में अयोध्या की छवि को धूमिल करना उन नेताओं के वैचारिक दिवालियापन को दर्शाता है, जिनके पास जनता के बीच जाने के लिए अब कोई ठोस एजेंडा नहीं बचा है। ये नेता इस प्रकरण को अपना ‘रीलांच-पैड’ समझ रहे हैं, जो उनकी सबसे बड़ी भूल है।
जनता तमाशा करने वालों और सरोकार रखने वालों के बीच का अंतर बखूबी समझती है। रेत पर खड़ा किया गया सियासी महल कभी टिकाऊ नहीं होता। यह देखना दिलचस्प होगा कि घड़ियाली आंसू बहाकर अपनी जमीन तलाश रहे इन नेताओं को भविष्य में क्या हासिल होता है। इतिहास गवाह है कि जन-आस्था और भावनाओं के साथ खिलवाड़ करने वाले अंततः इतिहास के पन्नों में ही खो जाते हैं।
– आलोक चंद्रा, पूर्व मुख्य प्रशासनिक अधिकारी, भारतीय प्रबंध संस्थान, कोलकाता
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