जून में थोक महंगाई का 44 महीने का रिकॉर्ड टूटा, 9.87% पर पहुंची दर
देश में महंगाई का ग्राफ लगातार ऊपर की ओर जा रहा है। वाणिज्य मंत्रालय द्वारा 14 जुलाई को जारी किए गए ताजा आंकड़ों के अनुसार, जून महीने में थोक मूल्य सूचकांक (WPI) आधारित महंगाई दर बढ़कर 9.87% दर्ज की गई है। इससे पिछले महीने यानी मई में यह आंकड़ा 9.68% था। यह पिछले 44 महीनों में थोक महंगाई का उच्चतम स्तर है। गौरतलब है कि इससे पहले सितंबर 2022 में महंगाई दर 10.70% के स्तर तक पहुंच गई थी।
महंगाई में इस उछाल के पीछे मुख्य रूप से रोजमर्रा के सामानों और खाद्य पदार्थों की कीमतों में हुई बढ़ोतरी को जिम्मेदार माना जा रहा है। हालांकि, राहत की बात यह है कि फ्यूल और पावर सेक्टर में महंगाई दर में कुछ कमी देखी गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि अमेरिका और ईरान के बीच चल रहा भू-राजनीतिक तनाव जल्द कम नहीं हुआ, तो ईंधन की कीमतें फिर से बढ़ सकती हैं, जिसका सीधा असर आम जनता की जेब पर पड़ेगा।
महंगाई का सेक्टर-वार विश्लेषण
- प्राइमरी आर्टिकल्स: दैनिक उपयोग की वस्तुओं की महंगाई दर 4.99% से उछलकर 7.00% हो गई है।
- खाद्य सामग्री (Food Index): खाने-पीने की चीजों की महंगाई दर 4.49% से बढ़कर 6.14% पर पहुंच गई है।
- फ्यूल और पावर: इस सेक्टर में थोक महंगाई दर 30.33% से गिरकर 27.41% रही है।
- मैन्युफैक्चरिंग प्रोडक्ट्स: विनिर्माण उत्पादों की थोक महंगाई में कोई खास बदलाव नहीं आया है और यह 7.48% पर स्थिर है।
वर्ष 2026 में थोक महंगाई का सफर
| महीना | थोक महंगाई दर |
|---|---|
| जनवरी | 1.81% |
| फरवरी | 2.13% |
| मार्च | 3.88% |
| अप्रैल | 8.26% |
| मई | 9.68% |
| जून | 9.87% |
आम आदमी पर क्या होगा असर?
थोक महंगाई दर के लंबे समय तक ऊंचे स्तर पर बने रहने का सीधा असर उत्पादन क्षेत्र पर पड़ता है। जब उत्पादकों के लिए कच्चे माल की लागत बढ़ती है, तो वे अंततः इस बोझ को ग्राहकों पर डाल देते हैं, जिससे खुदरा बाजार में भी चीजें महंगी हो जाती हैं। सरकार टैक्स कटौती (जैसे एक्साइज ड्यूटी) के जरिए इसे नियंत्रित करने का प्रयास करती है, लेकिन इसकी भी अपनी सीमाएं होती हैं।
महंगाई मापने का तरीका: WPI बनाम CPI
भारत में महंगाई को दो मुख्य पैमानों पर मापा जाता है। पहला है खुदरा महंगाई (Retail Inflation), जिसे कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स (CPI) कहते हैं, जो आम उपभोक्ताओं द्वारा चुकाई जाने वाली कीमतों पर आधारित होती है। दूसरा है थोक महंगाई (WPI), जो थोक बाजारों में कारोबारियों के बीच होने वाले लेनदेन की कीमतों को दर्शाता है।
WPI में मैन्युफैक्चर्ड प्रोडक्ट्स की हिस्सेदारी सबसे अधिक (63.75%) होती है, जबकि प्राइमरी आर्टिकल्स की 22.62% और फ्यूल एवं पावर की 13.15% भागीदारी होती है। इसके विपरीत, रिटेल महंगाई में खाद्य वस्तुओं और हाउसिंग का वेटेज अधिक होता है।
