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जोधपुर: राजस्थानी भाषा को संवैधानिक दर्जा देने की मांग तेज
जोधपुर में छात्र राजनीति से जुड़े पूर्व छात्रसंघ अध्यक्ष यशपाल सिंह कुम्पावत ने राजस्थान की मातृभाषा को लेकर एक बड़ा मुद्दा उठाया है। उन्होंने राज्य के सभी विश्वविद्यालयों में राजस्थानी भाषा के संरक्षण, अध्ययन और गहन शोध को बढ़ावा देने की पुरजोर मांग की है। कुम्पावत का मानना है कि राजस्थानी भाषा को अब और अधिक उपेक्षित नहीं रखा जा सकता और इसे भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल कर पूर्ण संवैधानिक मान्यता प्रदान की जानी चाहिए।
विश्वविद्यालयों में शोध केंद्रों की आवश्यकता
कुम्पावत ने इस बात पर जोर दिया कि राजस्थान का इतिहास, लोक संस्कृति और समृद्ध साहित्य राजस्थानी भाषा की कोख में ही सुरक्षित है। उन्होंने कहा कि प्रदेश के सभी विश्वविद्यालयों में राजस्थानी भाषा के लिए विशेष अध्ययन एवं शोध केंद्र स्थापित होने चाहिए। इससे न केवल हमारी सांस्कृतिक धरोहर का संरक्षण होगा, बल्कि आने वाली नई पीढ़ी भी अपनी जड़ों से जुड़ सकेगी।
- सांस्कृतिक विरासत: लोक साहित्य और ऐतिहासिक ग्रंथों का संरक्षण।
- नई पीढ़ी: युवाओं को अपनी भाषा और संस्कृति से जोड़ना।
- शैक्षणिक उत्थान: विश्वविद्यालयों में राजस्थानी भाषा के लिए विशेष पाठ्यक्रम।
शिक्षा नीति और मराठी भाषा पर रुख
विश्वविद्यालयों में मराठी भाषा पढ़ाए जाने के हालिया निर्णय पर प्रतिक्रिया देते हुए कुम्पावत ने इसे नीतिगत रूप से गलत ठहराया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि मराठी भाषा का अपना सम्मान है, लेकिन राजस्थान की धरती पर अपनी मातृभाषा को दरकिनार कर किसी अन्य भाषा को प्राथमिकता देना अनुचित है। उन्होंने कहा कि शैक्षणिक संस्थानों में विषयों का चयन राज्य की शिक्षा नीति के अनुरूप होना चाहिए, जिसमें राजस्थानी भाषा को प्राथमिकता मिलनी ही चाहिए।
केंद्र और राज्य सरकार से अपील
अपनी मांगों को लेकर कुम्पावत ने केंद्र और राज्य सरकार को एक स्पष्ट संदेश दिया है। उन्होंने कहा कि समय आ गया है कि सरकारें राजस्थानी भाषा को उसका वाजिब हक दें।
| मांग का बिंदु | उद्देश्य |
|---|---|
| आठवीं अनुसूची में शामिल करना | संवैधानिक संरक्षण और पहचान सुनिश्चित करना |
| शोध केंद्रों की स्थापना | भाषा का विकास और साहित्यिक संवर्धन |
| प्राथमिकता का निर्धारण | राज्य की शिक्षा नीति में राजस्थानी को उचित स्थान |
अंत में उन्होंने अपील की है कि राजस्थानी भाषा के विकास के लिए विशेष व्यवस्था की जाए ताकि प्रदेश की सांस्कृतिक पहचान को वैश्विक स्तर पर मजबूती मिल सके। कुम्पावत की इस मांग का राज्य के कई भाषाई विशेषज्ञों और छात्र संगठनों ने भी समर्थन किया है।










