Highcourt: सहमति से संबंध के बाद शादी से इनकार रेप नहीं, आरोपी बरी

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने बलात्कार और आत्महत्या के लिए उकसाने से जुड़े एक अत्यंत महत्वपूर्ण मामले में फैसला सुनाते हुए आरोपी को बड़ी राहत दी है। न्यायमूर्ति राजेंद्र कुमार वानी की एकल पीठ ने स्पष्ट किया कि यदि दो बालिगों के बीच आपसी सहमति से शारीरिक संबंध बने हैं और किन्हीं कारणों से विवाह संपन्न…

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: शादी से इनकार करना हर बार नहीं होता बलात्कार

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने बलात्कार और आत्महत्या के लिए उकसाने से जुड़े एक अत्यंत महत्वपूर्ण मामले में फैसला सुनाते हुए आरोपी को बड़ी राहत दी है। न्यायमूर्ति राजेंद्र कुमार वानी की एकल पीठ ने स्पष्ट किया कि यदि दो बालिगों के बीच आपसी सहमति से शारीरिक संबंध बने हैं और किन्हीं कारणों से विवाह संपन्न नहीं हो सका, तो केवल शादी से मुकर जाने के आधार पर आरोपी को दोषी नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने कहा कि किसी को अपराधी ठहराने के लिए यह साबित करना अनिवार्य है कि आरोपी की मंशा शुरुआत से ही धोखाधड़ी करने या शारीरिक शोषण की थी।

क्या था पूरा मामला?

यह मामला फरवरी 2020 का है, जब एक युवती का शव खेत में फंदे से लटका हुआ पाया गया था। पुलिस की गहन जांच और डीएनए रिपोर्ट से खुलासा हुआ कि मृतका गर्भवती थी। अभियोजन पक्ष ने आरोप लगाया था कि आरोपी ने युवती को शादी का झूठा सपना दिखाकर शारीरिक संबंध बनाए और बाद में शादी से इनकार कर दिया। आरोप था कि इसी मानसिक प्रताड़ना के कारण युवती ने आत्महत्या जैसा कदम उठाया। हालांकि, अदालत में यह बात भी सामने आई कि मृतका के परिजन दोनों के प्रेम संबंधों से पहले से वाकिफ थे और उन्हें इस रिश्ते पर कोई आपत्ति नहीं थी।

अदालत की मुख्य टिप्पणियां

हाईकोर्ट ने अपने आदेश में महत्वपूर्ण कानूनी बिंदुओं को रेखांकित किया है, जो निम्नलिखित हैं:

  • रिकॉर्ड में ऐसा कोई ठोस सबूत नहीं मिला जिससे यह साबित हो सके कि आरोपी की नीयत शुरुआत से ही गलत थी।
  • यदि विवाह का प्रस्ताव शुरुआत में वास्तविक था, लेकिन बाद में परिस्थितियों के कारण शादी नहीं हो पाई, तो इसे बलात्कार (Rape) की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता।
  • केवल शादी से इनकार करने को आत्महत्या के लिए उकसाने का आधार तब तक नहीं माना जा सकता, जब तक कि आरोपी के कृत्य और आत्महत्या के बीच सीधा संबंध स्थापित न हो।

संदेह का लाभ और दोषमुक्ति

न्यायालय ने आपराधिक न्याय शास्त्र के स्थापित सिद्धांतों का हवाला देते हुए कहा कि यदि साक्ष्यों से दो संभावनाएं बनती हैं, तो आरोपी के पक्ष वाली संभावना को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। अदालत ने माना कि अभियोजन पक्ष आरोपी के खिलाफ आरोपों को संदेह से परे (Beyond Reasonable Doubt) सिद्ध करने में पूरी तरह विफल रहा है। इस आधार पर, हाईकोर्ट ने निचली अदालत द्वारा दी गई सजा को खारिज कर दिया और आरोपी को सभी आरोपों से दोषमुक्त कर दिया।

मुद्दा न्यायालय का रुख
आपसी सहमति कानूनी रूप से वैध
शादी से इनकार स्वयं में बलात्कार नहीं
सबूत का भार अभियोजन पक्ष साबित करने में विफल
अंतिम निर्णय आरोपी को दोषमुक्त किया गया

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