Slimanabad Tunnel: विस्थापितों का दर्द, बुनियादी सुविधाओं से महरूम है जिंदगी

मध्य प्रदेश के कटनी जिले में मुख्यमंत्री के विकास कार्यों के तमाम दावों की पोल स्लीमनाबाद टनल परियोजना से विस्थापित हुए मोहड़ापुरा के आदिवासी परिवार खोल रहे हैं। तीन साल पहले इन परिवारों को उनकी पुश्तैनी जमीन से बेदखल कर 5 किलोमीटर दूर एक ऐसे स्थान पर बसाया गया, जहाँ बुनियादी सुविधाओं का घोर अभाव…

कटनी: स्लीमनाबाद टनल विस्थापितों का दर्द, विकास के दावों के बीच अंधेरे में जीने को मजबूर आदिवासी

मध्य प्रदेश के कटनी जिले में मुख्यमंत्री के विकास कार्यों के तमाम दावों की पोल स्लीमनाबाद टनल परियोजना से विस्थापित हुए मोहड़ापुरा के आदिवासी परिवार खोल रहे हैं। तीन साल पहले इन परिवारों को उनकी पुश्तैनी जमीन से बेदखल कर 5 किलोमीटर दूर एक ऐसे स्थान पर बसाया गया, जहाँ बुनियादी सुविधाओं का घोर अभाव है। प्रशासनिक दस्तावेजों में इसे ‘पुनर्वास स्थल’ का नाम तो दिया गया, लेकिन हकीकत में यह जगह किसी सुनसान जंगल से कम नहीं है।

झूठे वादों का शिकार हुए आदिवासी परिवार

विस्थापित सुशील कुमार कोल का कहना है कि विस्थापन के समय कंपनी और प्रशासन के अधिकारियों ने बड़े-बड़े वादे किए थे। उन्हें पक्की सड़कों, 24 घंटे बिजली और शुद्ध पेयजल का सपना दिखाया गया था। सुशील बताते हैं, “हमें लगा था कि हमारी तकदीर बदल जाएगी, लेकिन तीन साल बाद भी हम बुनियादी सुविधाओं के लिए तरस रहे हैं। कंपनी ने शुरुआत में एक ट्रांसफार्मर जरूर लगाया, लेकिन बिजली बिल का भुगतान न होने के कारण विभाग ने लाखों रुपये के बकाये का हवाला देकर कनेक्शन काट दिया।”

अंधेरे और दलदल के बीच सिमटा जीवन

बस्ती की दुर्दशा का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि यहाँ पहुँचने का मार्ग महज एक संकरी पगडंडी है, जिसे कागजों में सड़क का दर्जा दिया गया है। बारिश के मौसम में यह रास्ता दलदल में तब्दील हो जाता है। स्थानीय निवासी ज्योति कोल ने रोते हुए कहा, “कंपनी ने हमें इंसानों की तरह नहीं, बल्कि कचरे की तरह इस जंगल में फेंक दिया है। हमारे बच्चे बिना बिजली के पढ़ने को मजबूर हैं, उनका भविष्य इस अंधेरे में डूब रहा है।”

  • बिजली का संकट: 15 लाख रुपये का बिल बकाया होने के कारण एक साल से बिजली आपूर्ति ठप है।
  • शिक्षा पर असर: रोशनी के अभाव में बच्चों की पढ़ाई पूरी तरह प्रभावित हो रही है।
  • खस्ताहाल रास्ता: पक्की सड़क के नाम पर सिर्फ पत्थरों और धूल भरी पगडंडी है।

मुआवजे में घोटाले का आरोप

विस्थापन के दौरान मिले मुआवजे को लेकर भी ग्रामीणों में भारी आक्रोश है। राकेश नामक विस्थापित ने इस पूरी प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए इसे एक बड़ा घोटाला करार दिया है। राकेश का दावा है कि उनके और उनके भाई के हिस्से में मात्र 2.25 लाख रुपये का मुआवजा आया, जिससे आज के दौर में पक्का मकान बनाना तो दूर, सिर छुपाने के लिए एक कमरा बनाना भी नामुमकिन है। उन्होंने इसे आदिवासियों के हक पर डाका बताया है।

जिम्मेदारों का पक्ष

इस गंभीर मामले पर जब स्लीमनाबाद के कनिष्ठ विद्युत अभियंता (JE) सुमित सिंनहा से बात की गई, तो उन्होंने अपनी बेबसी जाहिर की। उन्होंने स्पष्ट किया कि गांव की विद्युत आपूर्ति लगभग एक वर्ष से बंद है।

विभाग स्थिति/तर्क
विद्युत विभाग 15 लाख रुपये का बिल बकाया है, भुगतान होने पर ही बिजली बहाल होगी।
प्रशासन विस्थापितों के बुनियादी दावों पर अभी भी चुप्पी साधे हुए है।

फिलहाल, ये आदिवासी परिवार सरकार से गुहार लगा रहे हैं कि उनके जीवन में उजाला वापस लाया जाए और उन्हें वे बुनियादी सुविधाएं दी जाएं, जिनका वादा कर उन्हें उनके पुश्तैनी घरों से बेदखल किया गया था।


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