Promotion: वन विभाग के कर्मचारियों ने कार्यवाहक पद के लिए की मांग

मध्य प्रदेश में हाल ही में लागू हुए पदोन्नति नियम-2025 के बाद वन विभाग में एक नई बहस छिड़ गई है। नए नियमों के दायरे में आने के बाद जो अधिकारी और कर्मचारी नियमित पदोन्नति पाने से वंचित रह गए हैं, उन्हें उनके वर्तमान कार्यवाहक पदों से न हटाने की मांग जोर पकड़ रही है।…

मध्य प्रदेश वन विभाग: कार्यवाहक अधिकारियों को न हटाने की उठी मांग

मध्य प्रदेश में हाल ही में लागू हुए पदोन्नति नियम-2025 के बाद वन विभाग में एक नई बहस छिड़ गई है। नए नियमों के दायरे में आने के बाद जो अधिकारी और कर्मचारी नियमित पदोन्नति पाने से वंचित रह गए हैं, उन्हें उनके वर्तमान कार्यवाहक पदों से न हटाने की मांग जोर पकड़ रही है। स्टेट फॉरेस्ट रेंज ऑफिसर्स (राजपत्रित) एसोसिएशन ने इस संबंध में प्रमुख सचिव, वन विभाग को एक औपचारिक पत्र सौंपा है, जिसमें मांग की गई है कि जब तक कोई ठोस नियमित व्यवस्था नहीं हो जाती, तब तक इन कर्मियों को उनके मौजूदा प्रभार पर यथावत रखा जाए।

एसोसिएशन के अध्यक्ष रविंद्र पाटीदार ने सरकार द्वारा लाए गए पदोन्नति नियमों का स्वागत करते हुए कहा कि इससे विभाग में एक बड़ा सकारात्मक बदलाव आया है। हालांकि, उन्होंने उन अधिकारियों की स्थिति पर चिंता जताई है, जिन्हें पूर्व में शासन के आदेशानुसार उच्च पदों का प्रभार सौंपा गया था, लेकिन अब वे नियमित प्रक्रिया में चयनित नहीं हो सके हैं।

पुलिस विभाग की तर्ज पर राहत की उम्मीद

एसोसिएशन ने अपनी मांग के समर्थन में पुलिस विभाग का उदाहरण दिया है। पत्र में स्पष्ट किया गया है कि राज्य में लगभग 15 हजार पुलिसकर्मियों को बिना डिमोट किए उनके कार्यवाहक पदों पर काम करने की अनुमति दी गई है। वन विभाग के अधिकारियों का तर्क है कि इसी तर्ज पर वन विभाग में भी समानता का व्यवहार किया जाना चाहिए।

विभागवर्तमान स्थिति/मांग
पुलिस विभाग15 हजार कर्मचारियों को कार्यवाहक पद पर यथावत रखा गया
वन विभागसमान आधार पर कार्यवाहक पद से न हटाने की मांग

मनोबल और प्रशासनिक दक्षता पर पड़ेगा प्रभाव

एसोसिएशन ने चेतावनी दी है कि यदि इन अधिकारियों को अचानक उनके कार्यवाहक पदों से हटा दिया गया, तो इससे न केवल उनका मनोबल गिरेगा, बल्कि विभाग की कार्यक्षमता भी प्रभावित होगी। संगठन ने निम्नलिखित सिद्धांतों का हवाला देते हुए शासन से सहानुभूतिपूर्वक विचार करने का आग्रह किया है:

  • वैध अपेक्षा का सिद्धांत (Doctrine of Legitimate Expectation): वर्षों से उच्च पदों की जिम्मेदारी संभाल रहे कर्मचारियों की उम्मीदों को बनाए रखना।
  • प्राकृतिक न्याय का सिद्धांत (Principles of Natural Justice): बिना किसी वैकल्पिक व्यवस्था के कर्मचारियों को अचानक पदमुक्त न करना।
  • प्रशासनिक निरंतरता: विभागीय कार्यों में किसी भी प्रकार के व्यवधान को रोकना।

स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी करने का आग्रह

एसोसिएशन ने प्रमुख सचिव से मांग की है कि इस पूरे मामले पर प्रदेश के सभी क्षेत्रीय कार्यालयों के लिए एकसमान और स्पष्ट गाइडलाइंस जारी की जाएं। ऐसा करने से नियमों की अलग-अलग व्याख्या होने और प्रशासनिक भ्रम की स्थिति से बचा जा सकेगा। संगठन को पूरी उम्मीद है कि राज्य सरकार विभागीय हित और कर्मचारियों की गरिमा को ध्यान में रखते हुए जल्द ही एक न्यायोचित निर्णय लेगी ताकि प्रशासनिक व्यवस्था सुचारू रूप से चलती रहे।