शर्मिला टैगोर ने शादी के बाद अपनाया था इस्लाम, सबा पटौदी ने परिवार के धार्मिक मूल्यों पर किया खुलासा
दिग्गज अभिनेत्री शर्मिला टैगोर और पूर्व क्रिकेटर मंसूर अली खान पटौदी की शादी के दशकों बाद, उनकी बेटी सबा पटौदी ने परिवार के धार्मिक परिवेश को लेकर बड़ी जानकारी साझा की है। सबा ने बताया कि शादी के बाद उनकी मां ने इस्लाम धर्म अपना लिया था और बच्चों को इसी की शिक्षा दी, ताकि उन्हें अपनी जड़ों को लेकर कोई भ्रम न रहे। हालांकि, उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि परिवार में किसी पर भी कोई धर्म थोपा नहीं गया और बच्चों को अपनी पसंद का मार्ग चुनने की पूरी आजादी दी गई थी।
घर में नहीं था कोई मंदिर, लेकिन सभी त्योहारों का था सम्मान
एक साक्षात्कार में सबा पटौदी ने अपने बचपन और परवरिश के बारे में बात करते हुए कहा कि उनके घर में कोई मंदिर नहीं था और इस्लाम ही वह आधार था जिस पर उन्हें शिक्षित किया गया। उन्होंने कहा, “अम्मा और अब्बा की शादी के बाद, मां ने इस्लाम अपनाया और हमें भी उसी के अनुसार मार्गदर्शन दिया। उन्होंने मुझे इस्लाम, रमजान और अन्य धार्मिक पहलुओं को समझने में मदद की। इसके बाद यह पूरी तरह से हमारी मर्जी थी कि हम अपने जीवन में किस रास्ते को अपनाना चाहते हैं।”
सबा के अनुसार, उनके घर में धार्मिक कट्टरता के लिए कोई जगह नहीं थी। उन्होंने बताया कि भले ही उनके घर में इस्लाम का पालन होता था, लेकिन उनके परिवार में सभी धर्मों के प्रति सम्मान का भाव रहा है।
- धार्मिक स्वतंत्रता: बच्चों पर कोई धर्म थोपा नहीं गया; उन्हें अपनी आस्था चुनने की पूर्ण स्वतंत्रता थी।
- सांस्कृतिक सद्भाव: परिवार में दिवाली, होली और क्रिसमस जैसे त्योहार भी पूरे उत्साह के साथ मनाए जाते थे।
- सहिष्णुता का संदेश: सबा ने कहा कि वे इस्लाम से जुड़ाव महसूस करती हैं, लेकिन अन्य धर्मों का भी समान रूप से सम्मान करती हैं।
शादी के दौरान मिली थीं धमकियां
मंसूर अली खान पटौदी और शर्मिला टैगोर की प्रेम कहानी 1960 के दशक में शुरू हुई थी, जो उस दौर में काफी चर्चा का विषय रही थी। शर्मिला टैगोर ने पूर्व में एक साक्षात्कार में खुलासा किया था कि उनकी शादी के समय माहौल काफी तनावपूर्ण था। उन्होंने बताया था कि उस दौरान उनके माता-पिता को धमकियां दी गई थीं और ‘गोलियां चलेंगी’ जैसे संदेश वाले टेलीग्राम भेजे गए थे। सुरक्षा कारणों के चलते शादी के स्थान में भी आखिरी समय पर बदलाव करना पड़ा था।
सबा पटौदी का कहना है कि उनके माता-पिता द्वारा सिखाए गए ये उदारवादी मूल्य आज भी परिवार में बरकरार हैं, जो उनके भाई-बहनों के अंतरधार्मिक विवाहों में भी स्पष्ट रूप से झलकते हैं।









