राजेश खन्ना: एक युग का अंत, जब थम गई थी मुंबई की धड़कनें
18 जुलाई 2012 की दोपहर को जैसे ही यह खबर आई कि हिंदी सिनेमा के पहले सुपरस्टार राजेश खन्ना, जिन्हें प्यार से ‘काका बाबू’ कहा जाता था, अब हमारे बीच नहीं रहे, पूरे देश में शोक की लहर दौड़ गई। पिछले कई दिनों से मुंबई के कार्टर रोड स्थित उनके बंगले ‘आशीर्वाद’ के बाहर फैंस का तांता लगा हुआ था, जो अपने चहेते कलाकार की सलामती के लिए दुआएं मांग रहे थे। जैसे ही उनके निधन की पुष्टि हुई, सोशल मीडिया और न्यूज चैनलों के जरिए यह खबर आग की तरह फैली और आशीर्वाद के बाहर प्रशंसकों का हुजूम उमड़ पड़ा।
तेज बारिश भी राजेश खन्ना के आखिरी दर्शन की चाह रखने वाले फैंस के जज्बे को कम नहीं कर सकी। उनके पांच दशक लंबे फिल्मी करियर में बने दोस्त और सहकर्मी भी उन्हें अंतिम विदाई देने पहुंचने लगे।
अंतिम शब्द: ‘टाइम हो गया है, पैक अप’
अमिताभ बच्चन जब राजेश खन्ना के अंतिम दर्शन के लिए पहुंचे, तो वे घर के सोफे पर बैठ गए। वहां मौजूद एक करीबी ने भारी मन और लड़खड़ाती आवाज में बताया कि सुपरस्टार के आखिरी शब्द थे— ‘टाइम हो गया है, पैक अप।’ यह कहते हुए वह व्यक्ति भावुक हो गया।
उस समय आशीर्वाद बंगले के आसपास का ट्रैफिक पूरी तरह ठप हो चुका था। भारी पुलिस बल तैनात किया गया, लेकिन भीड़ को नियंत्रित करना नामुमकिन था। न्यूज चैनलों पर उनकी फिल्म ‘आनंद’ का वह मशहूर संवाद बार-बार दिखाया जा रहा था: ‘बाबूमोशाय, जिंदगी बड़ी होनी चाहिए, लंबी नहीं।’ जिस अभिनेता को पर्दे पर मरते देख फैंस का दिल दहल जाता था, आज वह हकीकत में दुनिया को अलविदा कह चुके थे।
अंतिम यात्रा: मुंबई ने ऐसा जनसैलाब पहले कभी नहीं देखा
अगले दिन 19 जुलाई 2012 को उनका अंतिम संस्कार हुआ। सुबह से ही मूसलाधार बारिश हो रही थी। सफेद फूलों से सजी शव वाहन के साथ अंतिम यात्रा शुरू हुई। भीड़ इतनी बेकाबू थी कि शव वाहन को आगे बढ़ाना मुश्किल हो गया था। पत्नी डिंपल कपाड़िया, दोनों बेटियां, दामाद अक्षय कुमार और नातिन आरव इस दुखद घड़ी में साथ थे।
- फैन फॉलोइंग का आलम: अंतिम यात्रा में करीब 9 लाख से ज्यादा लोग शामिल हुए थे।
- अंतिम दर्शन की होड़: लोग लोकल ट्रेन स्टेशनों, फ्लाईओवर्स और बिजली के खंभों पर चढ़कर एक झलक पाने की कोशिश कर रहे थे।
- सुरक्षा व्यवस्था: भीड़ को नियंत्रित करने के लिए कई जगहों पर पुलिस को लाठीचार्ज भी करना पड़ा।
पवनहंस श्मशान भूमि में नातिन आरव ने अक्षय कुमार की मदद से उन्हें मुखाग्नि दी।
कैमरे के पीछे की आखिरी जंग
कैंसर जैसी गंभीर बीमारी से जूझने के बावजूद राजेश खन्ना का अभिनय के प्रति जुनून कम नहीं हुआ था। अपनी बीमारी और हेयरलाइन फ्रैक्चर के बावजूद, उन्होंने डॉक्टर्स की सलाह को दरकिनार करते हुए शूटिंग जारी रखी। अस्पताल से डिस्चार्ज मिलते ही वह घर जाने के बजाय सीधे टीम के साथ बैंगलोर शूटिंग के लिए निकल गए थे।
सेट पर अपनी आखिरी लाइनों में उन्होंने कहा था: ‘फैंस क्या होते हैं, मुझसे पूछो… मेरे फैंस मुझसे कोई नहीं छीन सकता।’ शाम को जैसे ही डायरेक्टर ने ‘पैकअप’ कहा, पूरी टीम ने खड़े होकर उनके लिए तालियां बजाईं। उन्होंने जाते-जाते मुड़कर सेट को एक आखिरी नजर देखी और फिर हमेशा के लिए ओझल हो गए।
एक रईस बचपन और सफलता की सीढ़ियां
राजेश खन्ना का जन्म 29 दिसंबर 1942 को अमृतसर में हुआ था। विभाजन के बाद उन्हें उनके रिश्तेदारों चुन्नीलाल और लीलावती खन्ना ने गोद ले लिया था। बचपन बेहद रईसी में बीता। थिएटर के प्रति उनका लगाव उन्हें मुंबई ले आया, जहां उन्होंने संघर्ष के बाद ‘आखिरी खत’ से डेब्यू किया।
| फिल्म का नाम | उपलब्धि |
|---|---|
| अराधना | सुपरस्टारडम की शुरुआत |
| हाथी मेरे साथी | बॉक्स ऑफिस पर बड़ी हिट |
| आनंद | अभिनय का लोहा मनवाया |
फैन फॉलोइंग के किस्से
राजेश खन्ना का स्टारडम ऐसा था कि लोग उनके लिए कुछ भी करने को तैयार रहते थे।
हावड़ा ब्रिज का वाकया: फिल्म ‘अमर प्रेम’ की शूटिंग के दौरान प्रशासन ने ब्रिज के नीचे शूटिंग की अनुमति देने से मना कर दिया था, क्योंकि डर था कि सुपरस्टार को देखने के लिए जुटने वाली भीड़ से पुल टूट सकता है।
नैनीताल झील: उनकी दीवानगी के कारण शूटिंग के दौरान नैनीताल झील को नावों से घेरना पड़ा था ताकि कोई हादसा न हो।
(नोट: यह लेख राजेश खन्ना के जीवन पर आधारित पुस्तक ‘राजेश खन्ना: द अनटोल्ड स्टोरी ऑफ इंडियाज फर्स्ट सुपरस्टार’ और अन्य शोधों पर आधारित है।)









