Snake-bite गैंग का पर्दाफाश: बिलासपुर में मौत को व्यापार बनाने वाले 17 गिरफ्तार

छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में हुए बहुचर्चित फर्जी सर्पदंश मुआवजा घोटाले ने पूरे प्रशासनिक तंत्र को हिलाकर रख दिया है। इस मामले में अब तक डॉक्टर, पुलिसकर्मी और राजस्व विभाग के कर्मचारियों समेत कुल 17 लोगों को गिरफ्तार किया जा चुका है। 'एडवोकेट डायमंड गैंग' के नाम से कुख्यात इस गिरोह ने पुलिस, स्वास्थ्य विभाग और…

छत्तीसगढ़: बिलासपुर सर्पदंश मुआवजा घोटाले में 17 गिरफ्तार, डॉक्टर और पुलिसकर्मी भी शामिल

छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में हुए बहुचर्चित फर्जी सर्पदंश मुआवजा घोटाले ने पूरे प्रशासनिक तंत्र को हिलाकर रख दिया है। इस मामले में अब तक डॉक्टर, पुलिसकर्मी और राजस्व विभाग के कर्मचारियों समेत कुल 17 लोगों को गिरफ्तार किया जा चुका है। ‘एडवोकेट डायमंड गैंग’ के नाम से कुख्यात इस गिरोह ने पुलिस, स्वास्थ्य विभाग और तहसील कार्यालय के अधिकारियों के साथ मिलकर सरकारी खजाने को करोड़ों का चूना लगाया है। पुलिस लगातार अलग-अलग FIR दर्ज कर आरोपियों की धरपकड़ कर रही है। हाल ही में तहसील कार्यालय के 3 कर्मचारियों के बाद 2 पुलिसकर्मियों को भी गिरफ्तार किया गया है, जबकि फर्जी पोस्टमार्टम रिपोर्ट बनाने वाले कई डॉक्टर फरार बताए जा रहे हैं।

ऐसे काम करता था ‘एडवोकेट डायमंड गैंग’

जांच में खुलासा हुआ है कि यह गिरोह सिम्स (CIMS) अस्पताल से लेकर तहसील कार्यालय तक एक सोची-समझी साजिश के तहत काम करता था। सिम्स में किसी की मौत होने पर पुलिसकर्मी और होमगार्ड के जवान गिरोह के सरगना, एडवोकेट हीरा खांडेकर को इसकी सूचना देते थे। इसके बाद गिरोह के सदस्य मृतक के परिजनों को सरकारी मुआवजे का लालच देकर उन्हें सर्पदंश से मौत की झूठी कहानी गढ़ने के लिए राजी कर लेते थे। लालच में आकर कई परिवार भी इस अपराध में शामिल हो जाते थे।

  • तहसील स्तर पर सेटिंग: दैनिक वेतनभोगी कर्मचारी गोविंद विश्वकर्मा 1 से 1.5 लाख रुपए लेकर तहसील स्तर पर फाइल को मंजूरी दिलाने का काम करता था।
  • फर्जी दस्तावेज: गिरोह फर्जी पीएम रिपोर्ट, पटवारी प्रतिवेदन और अन्य दस्तावेजों के जरिए मुआवजा प्रकरण तैयार करता था।
  • शवों से छेड़छाड़: कुछ मामलों में शवों पर सर्पदंश के निशान दिखाने के लिए उन्हें विकृत करने तक का आरोप है।

डॉक्टरों और तहसील की मिलीभगत

इस पूरे खेल में पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में हेरफेर करना सबसे अहम हिस्सा था। पुलिस के अनुसार, डॉ. प्रियंका सोनी और डॉ. एसएन बोले जैसे चिकित्सकों ने फर्जी पीएम रिपोर्ट और हस्ताक्षर का उपयोग किया। इसके अलावा, तहसील और एसडीएम कार्यालय के रीडरों की आईडी का गलत इस्तेमाल कर मुआवजा प्रकरणों को स्वीकृति दिलाई जाती थी। कोनी थाने में दर्ज तीन मामलों की जांच में तो सभी दस्तावेज फर्जी पाए गए हैं, जिनमें से दो मामलों में मृतकों के परिजनों को मुआवजे की जानकारी तक नहीं थी।

फरार डॉक्टरों की तलाश और पुलिस की दबिश

पुलिस ने अब तक 14 से अधिक स्थानों पर छापेमारी की है। डॉ. एसएन बोले के खिलाफ फर्जी रिपोर्ट जारी करने का आरोप है और उनके फरार होने की सूचना है। सिम्स के डीन डॉ. रमणेश मूर्ति ने पुष्टि की है कि डॉ. बोले अपनी छुट्टी खत्म होने के बावजूद ड्यूटी पर नहीं लौटे हैं। उधर, एसएसपी ने स्पष्ट कर दिया है कि इस सिंडिकेट में शामिल किसी भी व्यक्ति को बख्शा नहीं जाएगा।

कर्मचारी संघ का विरोध

तहसील कार्यालय के तीन कर्मचारियों की गिरफ्तारी के बाद लिपिक वर्गीय कर्मचारी संघ ने पुलिस की कार्रवाई पर सवाल उठाए हैं। संघ का आरोप है कि पुलिस छोटे कर्मचारियों को निशाना बना रही है, जबकि असली जिम्मेदार बड़े अफसर अब भी जांच के दायरे से बाहर हैं। सोमवार को कलेक्ट्रेट पहुंचे फेडरेशन के पदाधिकारियों ने कलेक्टर और एसपी को ज्ञापन सौंपकर निष्पक्ष जांच की मांग की है। उनका कहना है कि सरकारी कर्मचारियों के साथ अपराधियों जैसा व्यवहार किया जा रहा है और प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया है।