मारुति सुजुकी की कारें होंगी महंगी, अगस्त से 30 हजार रुपये तक बढ़ेंगे दाम
देश की प्रमुख वाहन निर्माता कंपनी मारुति सुजुकी ने अपने ग्राहकों को बड़ा झटका देते हुए अपनी सभी कारों की कीमतों में बढ़ोतरी का ऐलान किया है। कंपनी अपने विभिन्न मॉडल्स और वैरिएंट्स के आधार पर दामों में 30,000 रुपये तक का इजाफा करने जा रही है। नई कीमतें अगस्त 2026 से प्रभावी रूप से लागू हो जाएंगी। मारुति सुजुकी ने मंगलवार, 21 जुलाई को शेयर बाजार को दी गई आधिकारिक रेगुलेटरी फाइलिंग में इस निर्णय की पुष्टि की है।
क्यों बढ़ रहे हैं दाम?
कीमतों में इस बढ़ोतरी के पीछे कंपनी ने मुख्य रूप से इनपुट कॉस्ट (लागत) में हुई भारी वृद्धि को जिम्मेदार ठहराया है। मारुति सुजुकी के अनुसार, पिछले कुछ महीनों में कंपनी ने अपने स्तर पर खर्चों को नियंत्रित करने का भरसक प्रयास किया था ताकि ग्राहकों पर अतिरिक्त बोझ न पड़े। हालांकि, बढ़ती महंगाई और चुनौतीपूर्ण कारोबारी परिस्थितियों के चलते कंपनी के लिए उत्पादन लागत का कुछ हिस्सा ग्राहकों पर डालना अनिवार्य हो गया है।
दो महीने में दूसरी बार कीमतों में इजाफा
यह साल 2026 में मारुति सुजुकी द्वारा किया गया दूसरा बड़ा बदलाव है। इससे पहले जून 2026 में भी कंपनी ने अपने सभी मॉडल्स की कीमतों में 30,000 रुपये तक की वृद्धि की थी, जिसकी घोषणा 21 मई को की गई थी। विशेषज्ञों का मानना है कि अगस्त से लागू होने वाला यह नया संशोधन जून की कीमतों के ऊपर अतिरिक्त बोझ के रूप में आएगा।
पोर्टफोलियो पर असर
- विस्तृत रेंज: कंपनी भारतीय बाजार में 3.50 लाख रुपये से लेकर 25 लाख रुपये तक की गाड़ियां बेचती है।
- मॉडल श्रेणी: इसमें एंट्री-लेवल हैचबैक S-Presso से लेकर प्रीमियम MPV इनविक्टो तक शामिल हैं।
- महंगी होंगी कारें: अगस्त से होने वाली इस वृद्धि के बाद कंपनी के एंट्री-लेवल और प्रीमियम, दोनों ही सेगमेंट की कारें आम ग्राहकों के लिए महंगी हो जाएंगी।
महत्वपूर्ण शब्दावली
रेगुलेटरी फाइलिंग: शेयर बाजार में सूचीबद्ध कंपनियों के लिए यह अनिवार्य है कि वे किसी भी बड़े व्यावसायिक निर्णय या कीमतों में बदलाव की जानकारी सेबी (SEBI) या स्टॉक एक्सचेंज को दें। इसी प्रक्रिया को रेगुलेटरी फाइलिंग कहा जाता है।
इनपुट कॉस्ट: कार निर्माण में उपयोग होने वाले कच्चे माल जैसे स्टील, एल्युमिनियम, प्लास्टिक, रबर और इलेक्ट्रॉनिक्स कलपुर्जों की कुल लागत को इनपुट कॉस्ट कहते हैं। अंतरराष्ट्रीय बाजारों में कच्चे माल के महंगे होने का सीधा असर वाहन की मैन्युफैक्चरिंग लागत पर पड़ता है।









