कोटा में रियासत कालीन परंपरा: ‘वायु धारणा’ से मानसून और फसल के मिले संकेत
कोटा के ऐतिहासिक गढ़ पैलेस में बुधवार को आषाढ़ी पूर्णिमा के अवसर पर रियासत कालीन परंपरा का निर्वहन करते हुए ‘वायु धारणा’ परीक्षण संपन्न हुआ। 100 फीट ऊंचे जंतर की बुर्ज पर धर्म ध्वजा फहराकर की गई इस विशेष पूजा के जरिए हाड़ौती क्षेत्र में आगामी मानसून और फसल की स्थिति का पूर्वानुमान लगाया गया। इस प्राचीन परंपरा के अनुसार, हवा की दिशा और वेग के आधार पर यह संकेत मिले हैं कि क्षेत्र में इस बार मानसून की स्थिति संतोषजनक रहेगी और औसत से अच्छी बारिश होने की प्रबल संभावना है।
वायु धारणा और मानसून का पूर्वानुमान
पंडितों और आचार्यों की उपस्थिति में शाम 7:13 से 7:15 के बीच विशेष मुहूर्त में वायु की दिशा का अवलोकन किया गया। इस परीक्षण के मुख्य निष्कर्ष इस प्रकार हैं:
- अच्छी बारिश: हवा का रुख उत्तर से दक्षिण की ओर होने के संकेत मानसून के सक्रिय रहने और पर्याप्त वर्षा के शुभ संकेत हैं।
- कीटों का खतरा: वायु का प्रभाव उत्तर-पश्चिम (वायव्य कोण) और पूर्व-दक्षिण (आग्नेय कोण) की ओर रहने से फसलों पर टिड्डी जैसे कीटों के प्रकोप की आशंका बनी है।
- फसलों पर असर: विशेषज्ञों के अनुसार, यद्यपि वर्षा अच्छी होगी, लेकिन कुछ क्षेत्रों में जलभराव और कीटों के कारण किसानों को फसल हानि का सामना करना पड़ सकता है।
धान्य परीक्षण: पैदावार का होगा आकलन
वायु धारणा पूजन के पश्चात गढ़ पैलेस स्थित श्री बृजनाथ जी महाराज मंदिर में ‘धान्य परीक्षण’ की रस्म पूरी की गई। यह प्रक्रिया कृषि आधारित भविष्यवाणियों के लिए सदियों से चली आ रही है:
इस अनुष्ठान में हाड़ौती क्षेत्र में बोई जाने वाली विभिन्न फसलों के दानों की निश्चित मात्रा को अलग-अलग पात्रों में रखकर सफेद कपड़े से ढक दिया गया है। इन पात्रों को भगवान श्री रघुनाथ जी के समक्ष रखा गया है। गुरुवार सुबह मंगला आरती के बाद इन दानों का पुनः वजन किया जाएगा। मान्यता है कि जिस अनाज के वजन में बढ़ोतरी होगी, उस फसल की पैदावार उत्तम होगी, जबकि वजन में कमी आने पर उस फसल की पैदावार कम रहने का अनुमान लगाया जाता है।
इस संपूर्ण कार्यक्रम में आचार्य पंडित आशुतोष दाधीच, पंडित कुंज बिहारी गौतम, पंडित प्रेम नारायण शास्त्री, पंडित विद्याधर शास्त्री, पंडित पुरुषोत्तम शास्त्री, पंडित प्रहलाद शास्त्री, पंडित अवधेश और पंडित राधेश्याम सहित प्रमुख विद्वान मौजूद रहे। कोटा राजपरिवार द्वारा आज भी इस परंपरा को पूरी श्रद्धा के साथ जीवित रखा गया है, जो न केवल सांस्कृतिक धरोहर है, बल्कि स्थानीय किसानों के लिए कृषि संबंधी दिशा-निर्देश का भी एक माध्यम है।










