ईरान-अमेरिका तनाव से कच्चा तेल 98 डॉलर के पार, भारत में महंगाई और बाजार पर मंडराया संकट
अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव का सीधा असर वैश्विक ऊर्जा बाजार पर पड़ा है। 23 जुलाई को ब्रेंट क्रूड की कीमतें 4% की तेजी के साथ 98 डॉलर प्रति बैरल के स्तर को पार कर गईं, जो पिछले छह हफ्तों का उच्चतम स्तर है। वहीं, अमेरिकी क्रूड भी 89 डॉलर प्रति बैरल के करीब पहुंच गया है। कच्चे तेल में आई इस उछाल से भारत के आयात बिल पर दबाव बढ़ेगा, जिससे पेट्रोल-डीजल की कीमतों में बढ़ोतरी और आम आदमी की जेब पर महंगाई की मार पड़ने की आशंका जताई जा रही है।
लाल सागर में अशांति और सप्लाई चेन पर खतरा
तेल की कीमतों में इस अस्थिरता के पीछे पश्चिम एशिया में बिगड़ते हालात मुख्य कारण हैं। यमन के हूती विद्रोहियों द्वारा लाल सागर में सऊदी अरब के तेल टैंकरों पर हमला करने और बाब-अल-मंदेब जलडमरूमध्य में नाकेबंदी की घोषणा के बाद ग्लोबल ऑयल सप्लाई चेन पर गंभीर संकट खड़ा हो गया है। जानकारों का मानना है कि यदि यह गतिरोध लंबा खिंचता है, तो कच्चे तेल के दाम मनोवैज्ञानिक स्तर 100 डॉलर प्रति बैरल को भी पार कर सकते हैं।
भारतीय बाजार और तेल कंपनियों पर असर
कच्चे तेल के महंगे होने का प्रतिकूल प्रभाव भारत की ऑयल मार्केटिंग कंपनियों (OMCs) के शेयरों पर स्पष्ट रूप से देखा गया है। बाजार में हुई बिकवाली के कारण इन कंपनियों के शेयरों में भारी गिरावट दर्ज की गई है:
- हिंदुस्तान पेट्रोलियम (HPCL): 2.50% की गिरावट।
- इंडियन ऑयल (IOCL): 2% तक की कमजोरी।
- भारत पेट्रोलियम (BPCL): लगभग 1% की गिरावट।
इसके अलावा, कच्चे तेल की तेजी के कारण भारतीय शेयर बाजार भी दबाव में रहा। सेंसेक्स 364 अंक गिरकर 76,391 पर और निफ्टी 127 अंक टूटकर 23,870 पर बंद हुआ। रियल्टी, एनर्जी और बैंकिंग सेक्टर में निवेशकों ने सतर्क रुख अपनाया है।
LNG सप्लाई पर भी संकट के बादल
सिर्फ कच्चा तेल ही नहीं, बल्कि प्राकृतिक गैस की आपूर्ति भी प्रभावित हो सकती है। ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के अनुसार, कतर एनर्जी द्वारा लिक्विफाइड नेचुरल गैस (LNG) के शिपमेंट पर ‘फोर्स मैज्योर’ को अक्टूबर तक बढ़ाने की तैयारी है। यदि अगस्त और सितंबर के बाद अक्टूबर में भी कार्गो रद्द रहते हैं, तो सर्दियों से पहले वैश्विक स्तर पर गैस की भारी किल्लत हो सकती है, जिससे एशियाई और यूरोपीय देशों के बीच प्रतिस्पर्धा और बढ़ेगी।
क्या पेट्रोल-डीजल फिर होंगे महंगे?
भारत अपनी कुल तेल खपत का लगभग 85% आयात करता है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें सीधे तौर पर सरकारी तेल कंपनियों के मार्जिन को प्रभावित करती हैं। गौरतलब है कि मई महीने में भी अंतरराष्ट्रीय कीमतों में तेजी का हवाला देते हुए पेट्रोल और डीजल के दामों में 7.50 रुपये प्रति लीटर की बढ़ोतरी की गई थी। यदि वर्तमान स्थिति बनी रहती है, तो आने वाले समय में ईंधन की कीमतों में पुन: वृद्धि की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता है।










