जबलपुर: बायोमेट्रिक तकनीक बनी मजदूर के लिए वरदान, 13 साल पुराना रिकॉर्ड खोजकर बचाई जान
जबलपुर में डिजिटल क्रांति और बायोमेट्रिक तकनीक का एक अद्भुत उदाहरण देखने को मिला है, जिसने एक गंभीर रूप से घायल मजदूर के लिए जीवनदायिनी की भूमिका निभाई। सिहोरा निवासी अजय मेहरा, जो एक ऑटो दुर्घटना में बुरी तरह घायल हो गए थे, पिछले 15 दिनों से कटंगी बायपास स्थित एक निजी अस्पताल में जिंदगी और मौत के बीच जूझ रहे थे। मरीज के पास पहचान का कोई पुख्ता दस्तावेज न होने के कारण उनके इलाज पर संकट मंडराने लगा था, लेकिन प्रशासन की तत्परता ने उन्हें नई उम्मीद दी।
प्रशासन की तत्परता: छुट्टी के दिन भी मिशन मोड में काम
शनिवार शाम को जब अजय के पड़ोसी उन्हें एम्बुलेंस के जरिए कलेक्टर कार्यालय लेकर पहुंचे, तो दफ्तर बंद होने की तैयारी थी। हालांकि, स्थिति की गंभीरता को भांपते हुए प्रशासनिक अधिकारियों ने इसे एक चुनौती के रूप में स्वीकार किया। आधार केंद्र की दो टीमों ने अपनी छुट्टी को दरकिनार कर तुरंत मोर्चा संभाला और महज 2 घंटे की कड़ी मशक्कत के बाद शाम 6 बजे तक नया आधार कार्ड जारी कर दिया। इस त्वरित कार्रवाई से अस्पताल में अजय का रुका हुआ इलाज फिर से शुरू हो सका।
तकनीकी चुनौती और सफलता के आंकड़े
इस पूरी प्रक्रिया में बायोमेट्रिक मिलान सबसे महत्वपूर्ण कड़ी साबित हुआ। जबलपुर के डीजीसीएम चित्रांशु त्रिपाठी ने बताया कि अजय का आधार कार्ड वर्ष 2013 में बना था, लेकिन उन्हें अपना कोई भी विवरण याद नहीं था। टीम ने सर्वर पर जटिल सर्च ऑपरेशन चलाया, जिसका विवरण नीचे दिया गया है:
| विवरण | जानकारी |
|---|---|
| मरीज का नाम | अजय मेहरा |
| आधार कार्ड बनने का वर्ष | 2013 |
| सफलता का आधार | बायोमेट्रिक (फिंगरप्रिंट और आइरिस स्कैन) |
| खोज का समय | 2 घंटे |
कैसे मिली सफलता?
- विस्तृत सर्च: टीम ने सिहोरा क्षेत्र के विभिन्न पिन कोड और संभावित पतों के आधार पर डेटा खंगालना शुरू किया।
- बायोमेट्रिक मिलान: मरीज की उंगलियों के निशान और आंखों की पुतली (आइरिस) के जरिए सिस्टम में मिलान किया गया।
- सटीक परिणाम: अंततः, 1983 के जन्म वर्ष और बायोमेट्रिक डेटा के मिलान से 13 साल पुराना रिकॉर्ड ढूंढ लिया गया।
यह घटना साबित करती है कि कैसे आधुनिक डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर और संवेदनशील प्रशासन का तालमेल किसी व्यक्ति के लिए संजीवनी का काम कर सकता है। समय रहते मिली इस मदद ने न केवल अजय की पहचान सुनिश्चित की, बल्कि उनके उपचार में आ रही बाधा को भी पूरी तरह खत्म कर दिया।










