आषाढ़ स्कंद षष्ठी व्रत 2026: भगवान कार्तिकेय की पूजा से मिलेगी सुख-समृद्धि
आषाढ़ स्कंद षष्ठी व्रत 2026: आज आषाढ़ माह की पावन स्कंद षष्ठी मनाई जा रही है। हिंदू पंचांग के अनुसार, प्रत्येक माह के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को स्कंद षष्ठी के रूप में मनाया जाता है। यह विशेष दिन देवाधिदेव महादेव के पुत्र और देवताओं के सेनापति भगवान कार्तिकेय को समर्पित है। ऐसी मान्यता है कि इस दिन जो भी भक्त पूरे भक्ति-भाव और विधि-विधान से कार्तिकेय जी की आराधना करता है, उसे विशेष फल की प्राप्ति होती है और जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, स्कंद षष्ठी का व्रत रखने से भगवान कार्तिकेय की असीम कृपा प्राप्त होती है। इस व्रत के प्रभाव से जातक के जीवन में सुख, शांति और समृद्धि का वास होता है। साथ ही, यह व्रत साहस, विजय और संतान प्राप्ति के लिए अत्यंत प्रभावी माना गया है। जो लोग शत्रुओं के भय से परेशान हैं या कुंडली में मंगल दोष से जूझ रहे हैं, उनके लिए यह दिन विशेष कल्याणकारी है। आइए जानते हैं पूजा का शुभ मुहूर्त और विधि।
स्कंद षष्ठी का शुभ मुहूर्त (Ashadha Skanda Sashti Vrat 2026 Subh Muhurat)
आज के दिन की पूजा के लिए विभिन्न मुहूर्त अत्यंत शुभ माने गए हैं, जो इस प्रकार हैं:
| मुहूर्त का नाम | समय |
|---|---|
| ब्रह्म मुहूर्त | 04:44 AM से 05:27 AM |
| अभिजित मुहूर्त | 12:18 PM से 01:11 PM |
| विजय मुहूर्त | 02:56 PM से 03:49 PM |
| गोधूलि मुहूर्त | 07:18 PM से 07:39 PM |
| अमृत काल | 10:56 AM से 12:33 PM |
स्कंद षष्ठी की पूजा विधि (Skanda Sashti Vrat Puja Vidhi)
- स्नान और संकल्प: सुबह जल्दी उठकर पवित्र स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र धारण करें। इसके बाद व्रत का संकल्प लें।
- स्थापना: पूजा स्थल की सफाई कर एक चौकी पर भगवान कार्तिकेय और शिव परिवार की प्रतिमा या तस्वीर स्थापित करें।
- पूजन: भगवान को फूल, फल, धूप, दीप और नैवेद्य अर्पित करें। उनकी विधि-विधान से पूजा करें।
- मंत्र जाप और कथा: पूजा के दौरान कार्तिकेय जी के मंत्रों का जाप करें और ‘स्कंद षष्ठी व्रत कथा’ का पाठ अवश्य करें।
- आरती: अंत में भगवान की आरती करें और भोग लगाकर पूजा संपन्न करें।
स्कंद षष्ठी का महत्व (Skanda Sashti Vrat Significance)
सनातन धर्म में स्कंद षष्ठी को शक्ति और विजय का प्रतीक माना गया है। शास्त्रों में उल्लेख है कि इस दिन व्रत रखने से न केवल विजय श्री प्राप्त होती है, बल्कि यह संतान प्राप्ति की इच्छा रखने वाले दंपत्तियों के लिए भी अत्यंत फलदायी है। इस व्रत के पुण्य से संतान के जीवन में खुशहाली आती है और शारीरिक कष्टों व बीमारियों से मुक्ति मिलती है। यह व्रत व्यक्ति को मानसिक रूप से दृढ़ और साहसी बनाता है।
अस्वीकरण: इस लेख में दी गई जानकारी सामान्य धार्मिक मान्यताओं और लोक धारणाओं पर आधारित है। टीवी9 इसकी पुष्टि नहीं करता है।










