UP News: आखिर यूपी में दूसरा शाहीन बाग कौन बनाना चाहता है?

उत्तर प्रदेश में आगामी विधानसभा चुनावों की आहट के साथ ही राजनीतिक गलियारों में हलचल तेज हो गई है। विपक्ष पर आरोप लग रहे हैं कि राज्य में अशांति फैलाने के लिए हर संभव प्रयास किए जा रहे हैं, ताकि कानून-व्यवस्था की स्थिति पर सवाल खड़े कर सरकार को घेरा जा सके। मेरठ का चर्चित…

उत्तर प्रदेश में चुनाव से पहले ‘साजिशों’ का दौर: क्या मेरठ का ललिता हत्याकांड बना सियासी मोहरा?

उत्तर प्रदेश में आगामी विधानसभा चुनावों की आहट के साथ ही राजनीतिक गलियारों में हलचल तेज हो गई है। विपक्ष पर आरोप लग रहे हैं कि राज्य में अशांति फैलाने के लिए हर संभव प्रयास किए जा रहे हैं, ताकि कानून-व्यवस्था की स्थिति पर सवाल खड़े कर सरकार को घेरा जा सके। मेरठ का चर्चित ललिता हत्याकांड इसी रणनीति का एक हिस्सा प्रतीत होता है। मई महीने में हुई ललिता की हत्या के मामले में पुलिस ने त्वरित कार्रवाई करते हुए आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया था। जांच में सामने आया कि ललिता और आरोपी एक-दूसरे को जानते थे। चूंकि मृतका दलित समुदाय से थी और आरोपी पिछड़ा वर्ग से, इसलिए इसे जातिगत रंग देना विपक्ष के लिए शुरुआती दौर में मुश्किल था।

आरोपी ने शक के चलते ललिता की हत्या कर शव पर तेजाब डाल दिया था। पुलिस की तत्परता से आरोपी तुरंत सलाखों के पीछे थे, लेकिन जुलाई महीने में अचानक इस मामले ने तूल पकड़ लिया। सवाल यह उठता है कि जब न्याय की प्रक्रिया चल रही थी, तो दो महीने बाद अचानक बवाल क्यों शुरू किया गया? यह घटनाक्रम किसी सुनियोजित साजिश की ओर इशारा करता है, जहां व्यक्तिगत अपराध को राजनीतिक हथियार बनाने की कोशिश की गई।

क्या मेरठ में ‘शाहीन बाग’ जैसे प्रदर्शन की थी तैयारी?

सूत्रों की मानें तो जुलाई में मेरठ कलेक्ट्रेट के सामने ललिता को न्याय दिलाने के नाम पर जुटी भीड़ काफी संदिग्ध थी। पुलिस की जांच में यह बात सामने आई कि प्रदर्शन में शामिल करीब 2,000 लोग दिल्ली से आए थे। इनमें से कई चेहरे ऐसे थे, जिन्हें पूर्व में शाहीन बाग के प्रदर्शनों में देखा गया था। पुलिस सूत्रों के अनुसार, इस पूरे प्रदर्शन का मकसद ललिता को न्याय दिलाना नहीं, बल्कि मेरठ में ‘दूसरा शाहीन बाग’ खड़ा करना था।

मामले में नया मोड़ तब आया जब जिले के एसएसपी ने रवि गौतम नामक प्रदर्शनकारी को थप्पड़ मार दिया। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, रवि लगातार पुलिस को उकसा रहा था ताकि उसे पीटा जाए और मामला गरमा सके। एसएसपी के ब्राह्मण और प्रदर्शनकारी के दलित होने का लाभ उठाकर विपक्षी दलों ने इसे तुरंत ‘दलित उत्पीड़न’ का मुद्दा बना लिया। चंद्रशेखर और अखिलेश यादव जैसे नेताओं ने इस घटना का इस्तेमाल अपनी राजनीति चमकाने के लिए किया, जबकि पीड़ित परिवार पुलिस की कार्रवाई से पहले ही संतुष्ट था।

राजनीतिक स्वार्थ और ‘आंदोलनजीवियों’ का खेल

इस पूरे घटनाक्रम का विश्लेषण करें तो यह स्पष्ट होता है कि जब तक यह मामला केवल एक व्यक्तिगत अपराध था, किसी भी बड़े नेता को इसमें दिलचस्पी नहीं थी। लेकिन जैसे ही जातिगत समीकरण और पुलिस-जनता के बीच टकराव की स्थिति बनी, यह चुनावी मुद्दा बन गया।

प्रमुख बिंदुविवरण
अपराध का कारणव्यक्तिगत रंजिश और शक
पुलिस कार्रवाईत्वरित गिरफ्तारी और निष्पक्ष जांच
बाहरी हस्तक्षेपदिल्ली से आए प्रदर्शनकारियों की संदिग्ध भूमिका
सियासी लाभजातिगत ध्रुवीकरण की कोशिश

चुनावी माहौल में इस तरह के प्रायोजित आंदोलनों का उद्देश्य केवल जनता को परेशान करना और माहौल को खराब करना है। ललिता हत्याकांड जैसे संवेदनशील मामलों को राजनीतिक फसल काटने के लिए इस्तेमाल करना समाज के लिए घातक है। प्रशासन और जनता को ऐसे ‘आंदोलनजीवियों’ के प्रति सतर्क रहने की सख्त आवश्यकता है जो शांति व्यवस्था को भंग कर अपनी रोटियां सेंकना चाहते हैं।

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