High Court: सगोत्र विवाह पर बहिष्कार मामले में पुलिस को सुरक्षा के निर्देश

मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की इंदौर बेंच ने सगोत्र विवाह करने वाले दंपतियों के सामाजिक बहिष्कार और उन पर थोपे गए आर्थिक दंड के मामले में एक बड़ा और महत्वपूर्ण कदम उठाया है। जस्टिस सुबोध अभ्यंकर और न्यायमूर्ति आलोक अवस्थी की खंडपीठ ने इस मामले में राज्य शासन सहित सभी संबंधित पक्षों को नोटिस जारी…

सगोत्र विवाह पर सामाजिक बहिष्कार: मध्य प्रदेश हाई कोर्ट का सख्त रुख, राज्य सरकार को नोटिस जारी

मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की इंदौर बेंच ने सगोत्र विवाह करने वाले दंपतियों के सामाजिक बहिष्कार और उन पर थोपे गए आर्थिक दंड के मामले में एक बड़ा और महत्वपूर्ण कदम उठाया है। जस्टिस सुबोध अभ्यंकर और न्यायमूर्ति आलोक अवस्थी की खंडपीठ ने इस मामले में राज्य शासन सहित सभी संबंधित पक्षों को नोटिस जारी कर जवाब तलब किया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि याचिकाकर्ताओं की सुरक्षा सर्वोपरि है और किसी भी प्रकार की धमकी या दबाव की स्थिति में पुलिस को तुरंत कार्रवाई करनी होगी।

क्या है पूरा मामला?

यह मामला मुख्य रूप से बड़वानी, धार और खरगोन जिलों से जुड़ा है। आरोप है कि ‘क्षत्रिय कुशवाह समाज संगठन’ के कुछ पदाधिकारियों ने उन दंपतियों के खिलाफ तुगलकी फरमान जारी किए, जिन्होंने अपनी ही गोत्र में विवाह किया है। इन निर्णयों में शामिल हैं:

  • दंपती और उनके परिवारों का सामाजिक बहिष्कार करना।
  • समाज से निष्कासन की कार्रवाई करना।
  • विवाह समारोह में शामिल हुए लोगों पर भारी आर्थिक दंड लगाना।

याचिकाकर्ताओं का आरोप: मौलिक अधिकारों का हनन

याचिकाकर्ताओं ने कोर्ट को बताया कि विवाह के बाद से ही उन्हें लगातार धमकियां मिल रही हैं और सामाजिक दबाव के कारण उनका जीवन दूभर हो गया है। उनका तर्क है कि समाज के पदाधिकारियों द्वारा लिए गए ये निर्णय संविधान द्वारा प्रदत्त मौलिक अधिकारों का सीधा उल्लंघन हैं। पीड़ितों का कहना है कि उन्होंने स्थानीय पुलिस और जिला प्रशासन से मदद की गुहार लगाई थी, लेकिन कोई प्रभावी कदम न उठाए जाने के कारण उनकी सुरक्षा और सम्मान खतरे में है।

सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का दिया हवाला

याचिका में ‘शक्ति वाहिनी बनाम भारत संघ’ मामले में सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले का हवाला दिया गया है। याचिकाकर्ताओं के अधिवक्ता अभिनव पी. धनोडकर ने दलील दी कि कानूनन बालिग व्यक्तियों के विवाह में किसी भी जातीय संगठन, खाप पंचायत या निजी संस्था को हस्तक्षेप करने का कोई अधिकार नहीं है। किसी भी संगठन को समानांतर न्याय प्रणाली चलाने या लोगों को दंडित करने की अनुमति नहीं दी जा सकती।

पक्ष प्रमुख निर्देश
पुलिस प्रशासन सुरक्षा खतरा होने पर तत्काल हस्तक्षेप कर सुरक्षा सुनिश्चित करें।
राज्य शासन नोटिस का जवाब दें और मामले में अपना पक्ष रखें।
प्रतिवादी संगठन कोर्ट द्वारा जारी नोटिस का जवाब देना अनिवार्य है।

फिलहाल, हाई कोर्ट ने सभी शासकीय और निजी प्रतिवादियों को अपना जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है। कोर्ट के इस रुख से उन लोगों को बड़ी राहत मिलने की उम्मीद है, जो तथाकथित सामाजिक फरमानों के कारण प्रताड़ना का शिकार हो रहे हैं। मामले की अगली सुनवाई प्रतिवादियों के जवाब पेश होने के बाद तय की जाएगी।


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