देवतालाब शिव मंदिर घोटाला: आस्था के नाम पर 5.63 लाख का बंदरबांट, बिना टेंडर उड़ाए पैसे

मध्य प्रदेश के मऊगंज जिले स्थित प्रसिद्ध देवतालाब शिव मंदिर में आस्था की आड़ में भ्रष्टाचार का एक हैरान करने वाला मामला सामने आया है। सूचना के अधिकार (RTI) के तहत प्राप्त दस्तावेजों ने मंदिर प्रबंध समिति के दावों की पोल खोल दी है। इन दस्तावेजों से स्पष्ट है कि महाशिवरात्रि मेले के दौरान महज…

मऊगंज के देवतालाब शिव मंदिर में आस्था के नाम पर बड़ा घोटाला, RTI से हुआ बड़ा खुलासा

मध्य प्रदेश के मऊगंज जिले स्थित प्रसिद्ध देवतालाब शिव मंदिर में आस्था की आड़ में भ्रष्टाचार का एक हैरान करने वाला मामला सामने आया है। सूचना के अधिकार (RTI) के तहत प्राप्त दस्तावेजों ने मंदिर प्रबंध समिति के दावों की पोल खोल दी है। इन दस्तावेजों से स्पष्ट है कि महाशिवरात्रि मेले के दौरान महज 48 घंटे के भीतर नियमों को ताक पर रखकर सरकारी खजाने और श्रद्धालुओं के दान से जुटाए गए 5,63,500 रुपये का बंदरबांट कर लिया गया। इस पूरे खेल में न तो कोई टेंडर निकाला गया और न ही किसी सक्षम समिति से प्रस्ताव पास कराया गया।

मामले की गंभीरता को देखते हुए स्थानीय लोगों ने उच्च स्तरीय जांच की मांग की है। दस्तावेजों के मुताबिक, 13 फरवरी 2026 को विधायक गिरीश गौतम की अध्यक्षता में बैठक हुई थी, जिसमें केवल चार बिंदुओं पर चर्चा होनी थी। लेकिन, बैठक के महज दो दिन बाद ही लाखों रुपये के बिल तैयार कर भुगतान की प्रक्रिया शुरू कर दी गई। बिना किसी निविदा प्रक्रिया के चहेते ठेकेदारों को लाभ पहुंचाने का यह मामला सीधे तौर पर प्रशासनिक लापरवाही और मिलीभगत की ओर इशारा करता है, जिसने श्रद्धालुओं की भावनाओं को गहरी ठेस पहुंचाई है।

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कागजों पर हुआ लाखों का खर्च, हकीकत में मंदिर में दिखा सन्नाटा

जांच में सामने आया है कि मंदिर में सजावट और प्रसाद के नाम पर मनमाने बिल लगाए गए हैं:

  • फूलों की सजावट का फर्जीवाड़ा: इवेंट मैनेजर के नाम पर 1.50 लाख रुपये की 5,000 मालाओं का बिल पेश किया गया, जबकि मौके पर ऐसी कोई सजावट नहीं थी।
  • प्रसाद में धांधली: बिना किसी टेंडर के 2.50 लाख रुपये का भुगतान महाप्रसाद के नाम पर किया गया, जिसकी गुणवत्ता और वितरण पर भी बड़े सवाल खड़े हो रहे हैं।
  • पुराने बिलों का खेल: भ्रष्टाचार की हद तब पार हो गई जब 2025 के पुराने पेंट और हार्डवेयर के बिलों को भी 2026 के महाशिवरात्रि मेले के खर्च में जोड़कर भुगतान कर दिया गया।
  • नियमों की अनदेखी: तहसीलदार की आपत्तियों और कानूनी प्रक्रिया को दरकिनार करते हुए एसडीएम स्तर से इस भुगतान को मंजूरी दी गई।

प्रशासनिक मिलीभगत पर उठे सवाल

इस पूरे घोटाले में सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि प्रबंध समिति के सचिव (तहसीलदार) द्वारा भुगतान से पहले समिति के अनुमोदन की शर्त रखी गई थी, जिसे नजरअंदाज कर दिया गया। एक तरफ मंदिर परिसर में आज भी बुनियादी सुविधाओं जैसे सार्वजनिक शौचालयों का अभाव है, वहीं दूसरी ओर कागजों पर लाखों रुपये स्वाहा कर दिए गए। अब सवाल यह उठता है कि क्या प्रशासन इन सफेदपोशों और जिम्मेदार अधिकारियों पर कोई ठोस कार्रवाई करेगा या फिर आस्था के नाम पर यह लूट यूं ही जारी रहेगी?