Breaking: शादी का वादा तोड़ना रेप नहीं, हाईकोर्ट ने आरोपी को किया बरी

मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण कानूनी नजीर पेश करते हुए स्पष्ट किया है कि केवल शादी का वादा पूरा न करना या विवाह से मुकर जाना किसी व्यक्ति को दुष्कर्म (Rape) और आत्महत्या के लिए उकसाने का दोषी ठहराने के लिए पर्याप्त नहीं है। कोर्ट ने कहा कि शारीरिक संबंध और विवाह…

मध्य प्रदेश हाई कोर्ट का बड़ा फैसला: शादी से इनकार दुष्कर्म नहीं

मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण कानूनी नजीर पेश करते हुए स्पष्ट किया है कि केवल शादी का वादा पूरा न करना या विवाह से मुकर जाना किसी व्यक्ति को दुष्कर्म (Rape) और आत्महत्या के लिए उकसाने का दोषी ठहराने के लिए पर्याप्त नहीं है। कोर्ट ने कहा कि शारीरिक संबंध और विवाह का वादा टूटने के हर मामले को अपराध की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। जस्टिस राजेंद्र कुमार वानी की एकल पीठ ने निचली अदालत के फैसले को पलटते हुए आरोपी को सभी आरोपों से बरी कर दिया है।

क्या था पूरा मामला?

मामला एक युवक और युवती के बीच प्रेम संबंधों से जुड़ा था। युवती ने आरोप लगाया था कि युवक ने शादी का झूठा वादा कर उसके साथ शारीरिक संबंध बनाए, जिसके चलते वह गर्भवती हो गई। बाद में जब युवक ने शादी करने से इनकार किया, तो युवती ने आत्महत्या कर ली। डीएनए जांच में युवक को गर्भस्थ शिशु का जैविक पिता भी पाया गया था। इसके बावजूद, हाई कोर्ट ने साक्ष्यों का बारीकी से विश्लेषण करते हुए अपना फैसला सुनाया।

हाई कोर्ट की टिप्पणी और निष्कर्ष

अदालत ने सुनवाई के दौरान निम्नलिखित बिंदुओं को आधार बनाया:

  • सहमति से संबंध: कोर्ट ने पाया कि दोनों के रिश्तों की जानकारी युवती के परिवार को भी थी, जो यह दर्शाता है कि संबंध सहमति से थे।
  • धोखे की मंशा का अभाव: अभियोजन पक्ष यह साबित करने में नाकाम रहा कि आरोपी की शुरुआत से ही युवती को धोखा देने की नीयत थी।
  • आत्महत्या के लिए उकसावा: कोर्ट ने स्पष्ट किया कि शादी से इनकार करना या विवाह की शर्तों पर असहमति जताना स्वतः ही आत्महत्या के लिए उकसाने (Abetment to suicide) की श्रेणी में नहीं आता।

मामले का संक्षिप्त विवरण

मुद्दाहाई कोर्ट का रुख
शादी का वादा टूटनायह मात्र एक नागरिक विवाद हो सकता है, न कि दुष्कर्म।
शारीरिक संबंधयदि सहमति से हैं, तो इसे अपराध नहीं माना जाएगा।
आत्महत्या के आरोपआरोपी द्वारा प्रत्यक्ष उकसावे के ठोस सबूत नदारद।

अदालत ने अपने निष्कर्ष में कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपों को संदेह से परे (Beyond reasonable doubt) सिद्ध करने में पूरी तरह विफल रहा है। इस कानूनी फैसले ने उन मामलों में एक नई दिशा दी है जहाँ प्रेम संबंधों के टूटने के बाद आपसी सहमति के रिश्तों को जबरन दुष्कर्म का रूप देने का प्रयास किया जाता है। फिलहाल, हाई कोर्ट के इस आदेश के बाद आरोपी को बड़ी राहत मिली है।