Love story: क्या बणी-ठणी के लिए राजा ने छोड़ा राज-पाट? अनसुनी कहानी का अंत

राजस्थानी प्रेम कहानी के तीसरे भाग में हमने देखा कि कैसे किशनगढ़ के राजा सावंत सिंह ने अपने दरबारी चित्रकार से 'बणी-ठणी' की वह अद्भुत पेंटिंग बनवाई, जो प्रेम और सौंदर्य की पराकाष्ठा थी। अब इस प्रेम गाथा के चौथे और अंतिम चरण में पढ़िए कैसे एक राजा ने सत्ता त्यागकर अध्यात्म को अपना लिया।

राजस्थानी प्रेम गाथा: जब राजा सावंत सिंह ने राजपाट छोड़ चुना भक्ति का मार्ग

राजस्थानी प्रेम कहानी के तीसरे भाग में हमने देखा कि कैसे किशनगढ़ के राजा सावंत सिंह ने अपने दरबारी चित्रकार से ‘बणी-ठणी’ की वह अद्भुत पेंटिंग बनवाई, जो प्रेम और सौंदर्य की पराकाष्ठा थी। अब इस प्रेम गाथा के चौथे और अंतिम चरण में पढ़िए कैसे एक राजा ने सत्ता त्यागकर अध्यात्म को अपना लिया।

चौथे भाग में आगे की कहानी…

राजा सावंत सिंह का अधिकतर समय अब राजकाज के बजाय कृष्ण भक्ति, संगीत और काव्य रचनाओं में व्यतीत होने लगा था। राजा का ध्यान रियासत से हटकर ईश्वर की आराधना में अधिक लगने लगा था, जिसे लेकर राजदरबार में चिंता की लकीरें खिंचने लगीं। दरबार के मंत्री इस बात से परेशान थे कि उनका शासक अब एक राजा कम और भक्त अधिक हो चुका है।

काफी समय बाद जब राजा दरबार में उपस्थित हुए, तो वहां का माहौल तनावपूर्ण और असुरक्षित महसूस हो रहा था। वरिष्ठ मंत्री ने अत्यंत विनम्रता के साथ अपनी बात रखते हुए कहा, “महाराज, आपका अधिकांश समय साहित्य और भक्ति संगीत में बीत रहा है। क्या कला और साधना के लिए राज्य की सुरक्षा और राजकाज को दांव पर लगाना उचित है?”

मंत्री की इस बात पर अन्य दरबारियों ने भी सहमति जताई। इस तीखे प्रश्न ने राजा सावंत सिंह को गहरी सोच में डाल दिया। वे बिना कोई उत्तर दिए, मौन रहकर सिंहासन से उठे और चले गए। दरबार की यह बेचैनी अब महल की सीमाओं को लांघकर आम जनता तक पहुँचने लगी थी। राजा को इस स्थिति का भली-भांति आभास था।

अगले दिन, जब दरबार पुनः लगा, तो वहां सन्नाटा पसरा हुआ था। राजा सावंत सिंह ने राजसी वैभव के स्थान पर साधारण वस्त्र धारण कर प्रवेश किया। उन्होंने भरे दरबार में घोषणा की, “आप सभी की चिंताएं वाजिब हैं। लेकिन मेरे लिए कृष्ण भक्ति और प्रेम का मार्ग ही सर्वोपरि है। प्रजा के हित को सर्वोपरि रखते हुए, मैं अपना सिंहासन त्यागता हूं और वृंदावन प्रस्थान करने का निर्णय लेता हूं।”

राजा के इस अप्रत्याशित निर्णय से पूरा दरबार स्तब्ध था। वे उदास थे, लेकिन राजा के संकल्प के आगे किसी की न चली। समय बीतता गया और अंततः बणी-ठणी ने भी राजसी सुख-सुविधाओं का त्याग कर वृंदावन की शरण ली। कहा जाता है कि दोनों ने वृंदावन की एक साधारण कुटिया में शेष जीवन प्रभु के भजनों और काव्य रचनाओं को समर्पित कर दिया।

इस प्रकार, राजा सावंत सिंह और बणी-ठणी की यह कालजयी प्रेम कहानी चित्रकार निहाल चंद की कूची से राधा-कृष्ण के स्वरूप में हमेशा के लिए अमर हो गई। आज भी किशनगढ़ की झीलें और महल इस प्रेम कहानी की गवाही देते हैं। उनकी रचनाएं ‘नागरीदास’ और ‘रसिकबिहारी’ के नाम से आज भी वृंदावन की गलियों में गूंजती हैं।

(नोट: कहानी को रोचक बनाने के लिए क्रिएटिव लिबर्टी का सहारा लिया गया है। फोटो व पेंटिंग साभार: किशनगढ़ पूर्व राजपरिवार, चित्रकार शहज़ाद अली शेरानी)

ग्राफिक्स: भाविक जैन | इनपुट सहयोग: रोहित पारीक

अन्य कड़ियां:

  • भाग 1: क्या ‘बणी-ठणी’ केवल एक कल्पना थी या कोई वास्तविक महिला? जिसने किशनगढ़ शैली को विश्वभर में पहचान दिलाई।
  • भाग 2: राजा का खुद को कृष्ण और बणी-ठणी को राधा मानना; एक ऐसा प्रेम जिसने किशनगढ़ को वृंदावन बना दिया।
  • भाग 3: रहस्यमयी पेंटिंग के पीछे का सच: सुंदरता और भक्ति का अद्भुत संगम।