कर्क संक्रांति 2026: सूर्य का गोचर और दक्षिणायन की शुरुआतImage Credit source: PTI
कर्क संक्रांति 2026: सूर्य के राशि परिवर्तन का महत्व
सनातन धर्म में संक्रांति का पर्व अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है, जो सीधे तौर पर सूर्य देव के गोचर से जुड़ा होता है। जब भी सूर्य एक राशि से दूसरी राशि में प्रवेश करते हैं, तो उस विशिष्ट संक्रांति का उत्सव मनाया जाता है। द्रिक पंचांग के अनुसार, कल सूर्य देव चंद्रमा की राशि कर्क में प्रवेश करेंगे, जिससे कर्क संक्रांति का पर्व पूरे देश में हर्षोल्लास के साथ मनाया जाएगा। इस खगोलीय परिवर्तन के साथ ही हिंदू कैलेंडर में दक्षिणायन का काल भी प्रारंभ हो जाएगा।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, संक्रांति के दौरान पुण्य और महा पुण्य काल का विशेष महत्व है। इस दिन पवित्र नदियों में स्नान, दान-पुण्य और सूर्य उपासना करने से साधक के जीवन के सभी कष्ट दूर होते हैं और उन्हें अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है। शास्त्रों में इस दिन सूर्य देव की विशेष पूजा-अर्चना करने का विधान बताया गया है।
कर्क संक्रांति 2026 का पुण्य और महा पुण्य काल
इस वर्ष कर्क संक्रांति पर पूजा-पाठ और दान के लिए भक्तों को पर्याप्त समय प्राप्त होगा। द्रिक पंचांग के अनुसार, संक्रांति का सटीक क्षण कल रात 11 बजकर 45 मिनट पर होगा। इस अवसर पर पुण्य और महा पुण्य काल का विवरण नीचे दी गई तालिका में देखा जा सकता है:
| अवधि का प्रकार | समय | कुल अवधि |
|---|---|---|
| पुण्य काल | दोपहर 12:27 से रात 07:21 तक | 06 घंटे 53 मिनट |
| महा पुण्य काल | शाम 05:03 से रात 07:21 तक | 02 घंटे 18 मिनट |
धर्म शास्त्रों के अनुसार, महा पुण्य काल के दौरान किया गया दान, जप और तप सामान्य दिनों की तुलना में कई गुना अधिक फलदायी होता है।
दक्षिणायन का धार्मिक और वैज्ञानिक महत्व
कर्क संक्रांति को ज्योतिष और विज्ञान दोनों ही दृष्टिकोण से एक महत्वपूर्ण घटना माना जाता है। इसके प्रमुख बिंदु निम्नलिखित हैं:
- धार्मिक दृष्टिकोण: मकर संक्रांति से उत्तरायण शुरू होता है, जिसे देवताओं का दिन माना जाता है। इसके विपरीत, कर्क संक्रांति से दक्षिणायन की शुरुआत होती है, जिसे देवताओं का रात्रि काल माना जाता है।
- वैज्ञानिक दृष्टिकोण: इस दौरान सूर्य देव दक्षिणी गोलार्ध की ओर झुकते हैं। मानसून अपने चरम पर होता है और वर्षा ऋतु का प्रभाव बढ़ जाता है।
- दिन-रात पर प्रभाव: दक्षिणायन के कारण उत्तरी गोलार्ध में धीरे-धीरे दिन छोटे और रातें लंबी होने लगती हैं।
डिस्क्लेमर: इस लेख में दी गई जानकारी धार्मिक मान्यताओं और सामान्य सूचनाओं पर आधारित है। हमारा संस्थान इसकी पुष्टि नहीं करता है।









