गरियाबंद: छूत की बीमारी का डर बताकर महिला को खेत की झोपड़ी में छोड़ा, प्रशासन ने लिया संज्ञान
छत्तीसगढ़ के गरियाबंद जिले से एक बेहद संवेदनशील और मानवता को शर्मसार करने वाला मामला सामने आया है। जिले के धीगियामुडा गांव में 48 वर्षीय हीरा बाई नेताम को उनके ही परिवार ने कथित तौर पर ‘छूत की बीमारी’ का डर बताकर गांव से दूर एक खेत में बनी झोपड़ी में रहने के लिए मजबूर कर दिया। महिला लंबे समय से गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ रही है, लेकिन समाज और परिवार के डर ने उसे बदतर हालात में जीने पर विवश कर दिया था।
बीमारी से 20 साल का लंबा संघर्ष
परिजनों के अनुसार, हीरा बाई पिछले करीब 20 वर्षों से पैरों में सूजन और हाथों में घाव जैसी गंभीर शारीरिक समस्याओं से जूझ रही हैं। परिवार ने लंबे समय तक उनका इलाज कराया, लेकिन कोई खास राहत नहीं मिली। पिछले एक साल से आर्थिक तंगी और निराशा के चलते इलाज पूरी तरह बंद हो गया, जिससे उनकी स्थिति और अधिक बिगड़ गई। उनके हाथ-पैरों में बड़े फोड़े हो गए, जो अब नासूर का रूप ले चुके हैं।
सामाजिक दबाव में उठाया गया अमानवीय कदम
महिला के पति नरसिंह नेताम ने बताया कि गांव के लोगों ने उनकी पत्नी की बीमारी को ‘छूत का रोग’ करार दे दिया था। ग्रामीणों के भारी दबाव के कारण परिवार को मजबूरन यह कदम उठाना पड़ा।
- 2 जुलाई को महिला को गांव से आधा किलोमीटर दूर खेत की झोपड़ी में शिफ्ट किया गया।
- परिवार केवल भोजन देकर लौट आता था और महिला कई दिनों तक वहां अकेले रहने को मजबूर थी।
- सामाजिक बहिष्कार के डर से परिवार ने महिला से दूरी बना ली थी।
सोशल मीडिया के जरिए मिली मदद
जब यह मामला सोशल मीडिया और इंस्टाग्राम पर वायरल हुआ, तो जिला पंचायत अध्यक्ष गौरी शंकर कश्यप ने तुरंत संज्ञान लिया। वे एंबुलेंस के साथ मौके पर पहुंचे और महिला को उस झोपड़ी से बाहर निकालकर देवभोग अस्पताल में भर्ती कराया। जिला पंचायत अध्यक्ष ने इस घटना को दुर्भाग्यपूर्ण बताते हुए महिला के बेहतर इलाज का भरोसा दिलाया है।
क्या है चिकित्सा स्थिति?
देवभोग के बीएमओ डॉ. प्रकाश साहू ने महिला की प्रारंभिक जांच के बाद स्थिति की गंभीरता को स्पष्ट किया है:
| जांच का बिंदु | विवरण |
|---|---|
| संभावित बीमारी | गैंगरीन (Gangrene) के लक्षण |
| वर्तमान स्थिति | प्राथमिक उपचार शुरू कर दिया गया है |
| अगला कदम | बेहतर इलाज के लिए बड़े अस्पताल रेफर किया जाएगा |
फिलहाल, जिला प्रशासन ने महिला के समुचित उपचार का जिम्मा लिया है। इस घटना ने एक बार फिर समाज में व्याप्त अंधविश्वास और संवेदनहीनता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। प्रशासन का कहना है कि महिला को अब किसी भी तरह की कमी नहीं होने दी जाएगी और उसका पूरा इलाज सरकारी खर्च पर कराया जाएगा।









